जनता ने प्रतिनिधि चुने हैं नेताओं के अनुयायी नहीं फिर नेताओं के नारे क्यों?
जनता ने प्रतिनिधि चुने हैं नेताओं के अनुयायी नहीं फिर नेताओं के नारे क्यों?
नूरपुर : विनय महाजन /
नूरपुर प्रदेश मे पंचायत चुनावों के नतीजे आते ही एक पुरानी परंपरा फिर जीवित हो जाती हैकि चुनाव जीतने वाले कई जनप्रतिनिधि जनता का धन्यवाद करने से पहले नेताओं के घरों की ओर दौड़ पड़ते हैं। कहीं फूल-मालाएं लेकर पहुंचा जा रहा है, कहीं फोटो खिंचवाने की होड़ लगी है और कहीं यह साबित करने की कोशिश हो रही है कि उनकी जीत के पीछे किस नेता का आशीर्वाद था जबकि ऐसे नेता चुनावो में अपने प्रत्याशियों की मदद के लिए जनता के साथ जनता के दरवाजे पर वोट मांगने नहीं जाते.केवल मोबाइल फोन का उपयोग करते हैं l यह प्रवृत्ति केवल चिंताजनक ही नहीं बल्कि लोकतंत्र की मूल भावना के भी विपरीत है। लोगों का कहना है कि एक तरफ यह कहा जाता है कि पंचायती राज संस्था चुनाव पार्टी सिंबल पर नहीं हुआ है तो फिर निर्वाचित होने के बाद अपने नाम के नारे क्यों ? क्या वह अपना इलेक्शन भविष्य के लिए सोचते है l प्रचार के वक्त ऐसे नेताओं का यह कहना होता है कि तू भी मेरा मैं भी तेरा की नीति अपना कर आमने-सामने के प्रत्याशियों को अपने चुनाव के लिए एकजुट करना l सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर पंचायत चुनाव में जनता ने वोट किसे दिया था? किसी राजनीतिक दल को, किसी नेता को या उस व्यक्ति को जिसे उसने अपने गांव और पंचायत की जिम्मेदारी संभालने के योग्य समझा?
पंचायत चुनावों में मतदाता किसी पार्टी के चुनाव चिन्ह पर नहीं, बल्कि व्यक्ति की पहचान, उसके व्यवहार, उसकी उपलब्धता और उसके प्रति अपने विश्वास के आधार पर मतदान करते हैं।यदि जीत का श्रेय जनता के विश्वास को जाता है तो फिर जीत के बाद सबसे पहले नेताओं के दरबार में हाजिरी लगाने की आवश्यकता क्यों पड़ जाती है? ऐसी चर्चाएं देश और प्रदेश के युवा मतदाताओं में जिन्होंने पंचायती राज संस्था के चुनाव में नए चेहरे पंचायतों में चुनाव जीत कर भेजे हैं l चुनाव जीतने के बाद उसकी भूमिका बदल जाती है। राजनीति में नजदीकियां बदलती रहती हैं, समीकरण बदलते रहते हैं और सत्ता भी स्थायी नहीं होती। आज के दौर मे आवश्यकता इस बात की है कि पंचायत प्रतिनिधि यह समझें कि उनका सम्मान जनता ने बनाया है। यदि उन्हें धन्यवाद देना ही है, तो सबसे पहले उन मतदाताओं को दें जिन्होंने उन पर भरोसा किया। यदि उन्हें समय देना है, तो अपने गांव को दें। यदि उन्हें जवाब देना है, तो जनता को दें। और यदि उन्हें किसी दिशा में आगे बढ़ना है, तो वह दिशा ग्रामसभा और जनता की सामूहिक इच्छा से तय होनी चाहिए।जो जनप्रतिनिधि इस अंतर को समझ लेता है, वही वास्तव में जनता का सच्चा प्रतिनिधि कहलाने का अधिकार रखता है। बड़े मजे की बात यह है कि प्रदेश के चुनाव आयोग ने जो प्रभारी चुनाव कार्य प्रणाली के लिए नियुक्त किए गए थे उन्होंने भी पोस्टरो पर सियासी पार्टी के नेताओं के फोटो देखे होगे जबकि यह चुनाव गैर राजनीतिक नजर से था इन चुनाव आयोग ने कोई कार्यवाही नहीं जबकि सियासी दल के एक दल ने पार्टी मंडल की शिकायत पर ऐसे चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों को पार्टी से निलंबित कर दिया थाl

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