बदलते रिश्तों का दौर
बदलते रिश्तों का दौर
रिश्ते नाते
अब जमाना बदल चुका है
रिश्ता नाता मनमर्जी का हो चुका है
पंख निकलते ही परिंदे अपना ठिकाना भूल जाते हैं।
बाप की दौलत ज्यादा हो तो बच्चे कमाना भूल जाते हैं
बच्चे बचपन के प्यारे दुलारे लाल होते हैं
बड़े हो जाने पर मां बाप की कुर्बानी सब भूल जाते हैं
मोटी कमाई होने पर रिश्ते नाते सब भूल जाते हैं
अब कृष्ण सुदामा वाला दौर नहीं रहा अब गरीब वाले लोग रिश्ते बताना भूल जाते हैं
अगर पत्नी जरा सा कड़वा बोले तो पति घर आना भूल जाते हैं
लोग रिश्ते तो थोक में बनाते हैं मगर निभाना भूल जाते हैं
सब एक दूसरे की टांग खींच रहे हैं बस गिरे हुए को उठाना भूल जाते हैं
ऐसी गलती से कभी किसी से रूठ मत जाना आजकल लोग मनाना भी भूल जाते हैं
#वक्त ने वक्त वक्त पर अपनी करवट बदलेते आ गए
रिश्ते नाते अब मनमर्जी के बनाते चले गए
रिश्ते नाते सब संसार की मोह माया
सच्चे सीधे लोग अपना कर्म समझ नहीं आया
अच्छा इन्सान अपना फ़र्ज़ भूला नी पाया

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