शीर्षक : क्या हैं तेरा-मेरा रिश्ता
शीर्षक : क्या हैं तेरा-मेरा रिश्ता लेखक : कवि हरीश शर्मा लक्ष्मणगढ़िया की कलम से कुछ समझ नही आता, क्या हैं तेरा-मेरा रिश्ता कैसे मिले, क्यों मिले, कौन साथ दे रहा हैं फरिश्ता सोचते-सोचते उम्र ढल जाएगी आखिर इस रिश्ते की कहानी कब समझ आएगी टूटने को अनेकों तारे टूटते देखें हैं कुछ फरिश्तों को दफन होते देखे हैं कभी न समझ आई कुछ रिश्तों की कहानी आसमा के अलावा धरती पर भी तारे टूटते देखें हैं तेरा पास ना होने से खुदा को खोया खोया सा देखा हैं जब दिखा मुस्कुराता चेहरा तेरा तो चांद भी धरती पर नजर आया हैं तेरे जैसा मुखड़ा अब ओर कहा किसी मे नजर आया हैं तुझे कही खो ना दु, बस इसी बात से तो हरीश का दिल घबराया हैं बड़ा किस्मत वाला हु, कितनी मुद्दतो बाद इस चांद सी गुस्से वाली परी को पाया हैं ईश्वर के हाथों से कितनी मुश्किल से तो छीन कर ला पाया हैं अब क्या हैं तेरा-मेरा रिश्ता ये कहा अब-तक समझ आया हैं कुछ कहना-कुछ सुनना, 2 रु को लेकर बवाल खड़ा करना सामने वाले को दो-दो दिनों तक उदास रखना सुबह हिसाब आने की धमकी पाना छोटी-छोटी बातों पर बहुत कुछ सुना जाना हर बात पर केवल अपना ही हुकुम चलाना गुस्सा द...