होली बाहरी रंगों से नहीं, अपितु ईश्वर प्रेम और आत्मिक जागृति के रंग से खेली जानी चाहिए :- स्वामी हरिशानंद
होली बाहरी रंगों से नहीं, अपितु ईश्वर प्रेम और आत्मिक जागृति के रंग से खेली जानी चाहिए :- स्वामी हरिशानंद
नूरपुर : विनय महाजन /
नूरपुर दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के सत्संग आश्रम बौड़ में होली के पावन उपलक्ष्य में एक भव्य आध्यात्मिक सत्संग कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लेकर प्रभु भक्ति के रंग में स्वयं को सराबोर किया। वातावरण भक्ति, उल्लास और आध्यात्मिक चेतना से ओत-प्रोत रहा l कार्यक्रम का शुभारंभ महात्मा रमन द्वारा प्रभु महिमा से युक्त मधुर भजनों की प्रस्तुति से हुआ। उनके भावपूर्ण गायन ने उपस्थित श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति कराई। भजनों के माध्यम से उन्होंने संदेश दिया कि वास्तविक होली बाहरी रंगों से नहीं, अपितु ईश्वर प्रेम और आत्मिक जागृति के रंग से खेली जानी चाहिए। जब हृदय में प्रभु का नाम बस जाता है, तब जीवन स्वयं ही आनंदमय हो जाता है।इस अवसर पर संस्थान के संस्थापक एवं संचालक आशुतोष महाराज के शिष्य स्वामी हरिशानंद ने सत्संग के माध्यम से होली के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि अधर्म पर धर्म की विजय, अज्ञान पर ज्ञान की विजय तथा अहंकार पर भक्ति की विजय का प्रतीक है। पौराणिक काल की होली का उल्लेख करते हुए उन्होंने भक्त प्रह्लाद की अटूट श्रद्धा और विश्वास का वर्णन किया, जिसने विपरीत परिस्थितियों में भी ईश्वर का दामन नहीं छोड़ाl स्वामी जी ने कहा कि सच्ची होली तब खेली जाती है जब मन के विकार—काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार—होलिका दहन की अग्नि में समर्पित कर दिए जाएं। ब्रह्मज्ञान के माध्यम से ही मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान सकता है। गुरु ही वह माध्यम हैं जो शिष्य को अज्ञान रूपी अंधकार से निकालकर आत्मज्ञान के प्रकाश में स्थापित करते हैं। गुरु और शिष्य की होली प्रेम, समर्पण और आत्मिक एकता की होली होती है, जिसमें अहंकार का लेशमात्र भी स्थान नहीं होता।
कार्यक्रम के अंत में सभी श्रद्धालुओं ने संकल्प लिया कि वे जीवन में आध्यात्मिक मूल्यों को अपनाकर समाज में प्रेम, सद्भाव और भाईचारे का संदेश फैलाएंगे। इस प्रकार होली का यह पावन पर्व केवल उत्सव तक सीमित न रहकर आत्मिक जागरण का माध्यम बन गया।

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