कई जोत लांघ कर लाहौल घाटी पहुंचते, भूखे प्यासे हर दर्द सहन कर चलते भेड़ पालक

कई जोत लांघ कर लाहौल घाटी पहुंचते,भूखे प्यासे हर दर्द सहन कर चलते भेड़ पालक 

केलांग ( रंजीत लाहोली ) 

गर्मियों के सीजन शुरू होते ही भेड़पालकों ने मैदानी इलाकों से अब पहाड़ों की और जनजातीय जिला लाहौल घाटी की तरफ रुख किया। रास्ता कठिन होते हुए भी यह चले रहते हैं। रास्ता आमतौर पर सिर्फ चार माह तक ही खुला रहता है। भेड़ पालक अमूमन मई व जून महीने में लाहौल की ओर आते हैं, और अगस्त महीने से फिर मैदानी इलाकों की ओर चले जाते हैं। भेड़पालक ने बताया कि वह कई जोत लांघ कर लाहौल घाटी पहुंचते हैं। बर्फ बारी,बारीश गर्मी, सर्दी और कईं दिन भूखे प्यासे रहकर हर दर्द सहन कर कई महीने अपने परिवार वालों से दूर बैठते हैं। भेड़पालकों की हर साल कई दर्जनों के हिसाब से भेड़, बकरियां प्राकृतिक आपदा का शिकार होती हैं। जैसे ग्लेशियरों बीच चले जाती या बारिश के समय पहाड़ों से पत्थर गिरने से मर जाती हैं। परन्तु हर तरह की मुसीबतों का सामना करते हुए हम चले रहते हैं, हमारे कदम नहीं डगमगाते।


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