आने वाले समय में क्या शराब के साथ चिट्ठा भी वोट जुटाने का नया हथियार बन जाएगा?
आने वाले समय में क्या शराब के साथ चिट्ठा भी वोट जुटाने का नया हथियार बन जाएगा?
नूरपुर:-( विनय महाजन)
पंजाब और हिमाचल सहित देश के कई हिस्सों में नशे का फैलता जाल अब केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं रह गया है। यह एक ऐसा सामाजिक संकट बन चुका है जो परिवारों को तोड़ रहा है, युवाओं का भविष्य निगल रहा है और समाज की बुनियाद को खोखला कर रहा है। लेकिन इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि कहीं यह जहर धीरे-धीरे लोकतंत्र की नसों तक न पहुंच जाए।हमारे देश की चुनावी राजनीति का एक कड़वा सच यह भी है कि वर्षों से शराब का वितरण वोट हासिल करने का एक माध्यम बनता रहा है। चुनाव आयोग, पुलिस और प्रशासन चाहे जितनी सख्ती कर लें, चुनावों के दौरान शराब की बरामदगी की सूचना प्रशासन को मिलती रहती हैं लेकिन उसे नजरअंदाज कर दिया जाता हैl लेकिन आज यह कारोबार कुछ लोगों की रोजी-रोटी का साधन बन गया है l अब लोगों की जुबान पर चर्चा यह है क्या इसके पीछे सियासी दलों का हाथ है? चाहे चुनाव लोकसभा के हो या फिर विधानसभा के हो या पंचायती राज संस्था प्रणाली के चुनाव या नगर पंचायत या नगर परिषद के चुनाव कुछ मतदाताओं को रिझाने के लिए अक्सर कुछ वोटो की खातिर अपनी जीत हासिल करने के लिए इस प्रकार के हथकंडे अपनाये जाते हैं l लेकिन आज सवाल शराब का नहीं उससे कहीं अधिक खतरनाक नशा चिट्टे का है।यदि समाज में चिट्टे और अन्य घातक नशों के आदी लोगों की संख्या बढ़ती रही, तो क्या यह गारंटी दी जा सकती है कि भविष्य में कोई राजनीतिक तत्व इस वर्ग को भी वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश नहीं करेगा? राजनीति का इतिहास बताता है कि जब चुनाव जीतना सर्वोच्च लक्ष्य बन जाता है तो सिद्धांत और नैतिकताएं अक्सर पीछे छूट जाती हैं।प्रदेश मे कोई दिन ऐसा नहीं जाता जहां पुलिस द्वारा रोजाना गिरफ्तारियां ना हो रही हो l व्यवस्था परिवर्तन की सरकार ने इस मामले में नशे को खत्म करने के लिए कई नशा माफिया की संपत्तियों को भी जप्त किया हैl जिला कांगड़ा में इसका श्रेय जिला पुलिस प्रशासन को जाता है जिन्होंने क्षेत्र के लोगों के साथ मिलकर नशा माफिया की कमर को तोड़ने में सफलता हासिल की है जिसमें जिला पुलिस नूरपुर भी एक अहमियत रखता है l दुर्भाग्य यह है कि इस विषय पर समाज की प्रतिक्रिया उस गंभीरता की नहीं है जिसकी आवश्यकता है। राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप लगाते हैं, लेकिन समस्या के मूल कारणों पर गंभीर चर्चा कम दिखाई देती है।सियासी दल के नेता व कार्यकर्ता और समर्थक सब कुछ देखते हुए भी चुप हैं। शायद उन्हें लगता है कि यह समस्या उनके घर तक नहीं पहुंचेगीl यह जानकारी एक प्रेस नोट मे समाजसेवक राजीव पठानिया नूरपुर ने देते हुए बताया समाज के हर वर्ग और सियासी दलों के नेताओं को आपस में एकजुट होकर युवाओं को नशे से बचाने के लिए इस पर कठोर निर्णय करने होंगेl गिरफ्तारियां के माध्यम से इस जहरीले नशे को को खत्म नहीं किया जा सकता इसके लिए जागरूक कार्यक्रम शुरू करने होंगे जैसे व्यवस्था परिवर्तन की सरकार हिमाचल में कर रही है lइसके लिए पंचायती राज संस्था प्रणाली के निर्वाचित लोगों को भी आगे आना होगा l

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