शांता कुमार के बाद कांगड़ा से नहीं बन पाया कोई मुख्यमंत्री : साधू राम राणा !
शांता कुमार के बाद कांगड़ा से नहीं बन पाया कोई मुख्यमंत्री : साधू राम राणा !
ज्वाली : राजेश कतनौरिया /
ज्वाली पूर्व पंचायत समिति सदस्य एवं डोल पधर निवासी साधू राम राणा ने कहा कि प्रदेश के सबसे बड़े जिला कांगड़ा से शांता कुमार के बाद वर्ष 1993 से आज तक किसी भी राजनीतिक दल की ओर से मुख्यमंत्री पद के लिए कोई मजबूत और खुली दावेदारी सामने नहीं आ पाई है। उन्होंने कहा कि कांगड़ा की राजनीतिक फूट और आपसी असहयोग के कारण जिले के कई वरिष्ठ नेताओं के मुख्यमंत्री बनने के प्रयास भी सफल नहीं हो सके।
साधू राम राणा ने कहा कि स्वर्गीय सत महाजन, स्वर्गीय मेजर विजय सिंह मनकोटिया और पूर्व राजस्व मंत्री राजन सुशांत जैसे कांगड़ा के तेजतर्रार नेताओं ने अपने-अपने स्तर पर मुख्यमंत्री पद के लिए प्रयास किए, लेकिन उन्हें कांगड़ा से चुने हुए विधायकों का अपेक्षित सहयोग नहीं मिल सका। इसके चलते उनके प्रयास आगे नहीं बढ़ पाए।
उन्होंने कहा कि कांगड़ा प्रदेश का सबसे बड़ा जिला है और विधानसभा में सबसे अधिक विधायक भी यहीं से चुनकर आते हैं। इसके बावजूद राजनीतिक रूप से कांगड़ा मुख्यमंत्री पद की दौड़ में अपेक्षित मजबूती के साथ सामने नहीं आ पाया है। राणा ने कहा कि प्रदेश में लंबे समय तक अपर हिमाचल के नेताओं का मुख्यमंत्री पद पर दबदबा रहा है। इसके बाद कांगड़ा से एक बार तथा कांगड़ा से छोटे जिलों मंडी और हमीरपुर से भी मुख्यमंत्री बन चुके हैं।
राणा ने कहा कि आगामी वर्ष 2027 के विधानसभा चुनावों को लेकर भी मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में यदि भाजपा या कांग्रेस में से किसी दल को बहुमत मिलता है तो कांगड़ा से मुख्यमंत्री बनने की संभावना फिलहाल दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रही है। वहीं, मंडी और हमीरपुर से मुख्यमंत्री पद की संभावनाओं को लेकर राजनीतिक स्तर पर कवायद शुरू होने की चर्चा है।
उन्होंने कहा कि यह कांगड़ा के लिए चिंता का विषय है कि प्रदेश में सबसे अधिक विधानसभा सीटें होने और चंबा जैसे पड़ोसी जिले का समर्थन मिलने की संभावना के बावजूद कांगड़ा से किसी भी राजनीतिक दल का नेता मुख्यमंत्री पद का प्रबल दावेदार बनकर सामने नहीं आ रहा है। जबकि इससे छोटे जिले मंडी और हमीरपुर अपने नेताओं को मुख्यमंत्री पद तक पहुंचाने की राजनीतिक सोच के साथ आगे बढ़ते रहे हैं।
साधू राम राणा ने कांगड़ा के सभी राजनीतिक दलों के नेताओं से आह्वान किया कि वे जातिवाद और परिवारवाद की राजनीति से ऊपर उठकर जिले के हित में एकजुट हों। उन्होंने कहा कि चंबा के सहयोग से वर्ष 2027 में कांगड़ा से मुख्यमंत्री बनाने की सामूहिक सोच के साथ राजनीतिक रूप से आगे बढ़ने की आवश्यकता है, ताकि शांता कुमार के बाद एक बार फिर कांगड़ा को प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी मिल सके।

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