आईआईटी मंडी में एल.ए.आर.ए.एम कोर्स 2026 का शुभारंभ, भूस्खलन जोखिम आकलन पर जुटे अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ

 आईआईटी मंडी में एल.ए.आर.ए.एम कोर्स 2026 का शुभारंभ, भूस्खलन जोखिम आकलन पर जुटे अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ


मंडी : अजय सूर्या /

Indian Institute of Technology Mandi में मंगलवार को एल.ए.आर.ए.एम (लैंडस्लाइड रिस्क असेसमेंट एंड मिटिगेशन) कोर्स 2026 का शुभारंभ हुआ। छह दिवसीय यह अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम भूस्खलन आपदा जोखिम को कम करने और उसके वैज्ञानिक आकलन पर केंद्रित है। यह कार्यक्रम भारत में दूसरी बार भौतिक रूप में आयोजित किया जा रहा है।

एल.ए.आर.ए.एम स्कूल की स्थापना वर्ष 2005 में University of Salerno के जियोटेक्निकल इंजीनियरिंग ग्रुप द्वारा की गई थी। यह कोर्स पीएचडी शोधार्थियों, युवा वैज्ञानिकों और सिविल इंजीनियरिंग, पर्यावरण इंजीनियरिंग तथा भूविज्ञान जैसे क्षेत्रों के पेशेवरों के लिए एक महत्वपूर्ण वैश्विक प्रशिक्षण मंच बन चुका है। इससे पहले इसके संस्करण इटली, चीन और स्विट्ज़रलैंड में आयोजित किए जा चुके हैं।

आईआईटी मंडी में आयोजित इस कोर्स में स्विट्ज़रलैंड, इटली, नॉर्वे और भारत के 10 विशेषज्ञ भाग ले रहे हैं, जो लगभग 40 प्रतिभागियों—शोधार्थियों और विभिन्न संस्थानों के पेशेवरों—को व्याख्यान और प्रशिक्षण देंगे। पाठ्यक्रम को विशेष रूप से हिमालयी क्षेत्र की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है, जहां भूस्खलन और ढलान अस्थिरता से समुदायों, परिवहन नेटवर्क और बुनियादी ढांचे को गंभीर खतरा बना रहता है।

यह कार्यक्रम आईआईटी मंडी के सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज एंड डिजास्टर रिडक्शन (C3DAR) द्वारा आयोजित किया जा रहा है, जिसे Tata Trusts, National Disaster Management Authority और National Research Foundation का सहयोग प्राप्त है। कार्यक्रम के दौरान वैज्ञानिक व्याख्यान, तकनीकी चर्चाएं और फील्ड विजिट भी करवाई जाएंगी।

इस अवसर पर एल.ए.आर.ए.एम स्कूल के अध्यक्ष एवं Settimio Ferlisi ने कहा कि इस पहल का उद्देश्य भूस्खलन जोखिम को कम करने के लिए युवा शोधकर्ताओं का एक मजबूत अंतरराष्ट्रीय समुदाय तैयार करना है। वहीं कोर्स समन्वयक एवं C3DAR के अध्यक्ष Kala Venkata Uday ने कहा कि हिमालयी क्षेत्र की नाजुक भूगर्भीय संरचना, तेज़ विकास और बदलते जलवायु पैटर्न के कारण भूस्खलन की चुनौतियां बढ़ रही हैं, ऐसे में यह कार्यक्रम वैश्विक विशेषज्ञों और शोधार्थियों के बीच ज्ञान के आदान-प्रदान का महत्वपूर्ण मंच साबित होगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रम पहाड़ी क्षेत्रों में सुरक्षित और टिकाऊ विकास की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं तथा भूस्खलन आपदा जोखिम को कम करने में मददगार साबित होंगे।

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