भरमाड़ में कुम्हारों की सदियों पुरानी कला विलुप्ति के कगार पर
भरमाड़ में कुम्हारों की सदियों पुरानी कला विलुप्ति के कगार पर
ज्वाली : राजेश कतनौरिया /
ज्वाली विधानसभा क्षेत्र की ग्राम पंचायत भरमाड़ में कुम्हार समुदाय की सदियों पुरानी पारंपरिक कला अब धीरे-धीरे समाप्ति की ओर बढ़ रही है। कुम्हार जाति से संबंध रखने वाले यशपाल सिंह, शशि कुमार व संतोष कुमारी ने बताया कि उनके पूर्वज मिट्टी के बर्तन बनाने का कार्य करते थे और इसी से अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे।
यशपाल सिंह ने बताया कि उनके पिता ज्ञान सिंह स्वयं अपने हाथों से मिट्टी के घड़े व अन्य बर्तन तैयार करते थे, लेकिन बदलते समय के साथ यह परंपरा अब खत्म होती जा रही है। उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी इस कार्य में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रही, जिससे यह कला विलुप्त होने के कगार पर है।
उन्होंने आगे बताया कि पहले बैसाखी जैसे पर्व पर दोपहर तक ही अच्छी-खासी बिक्री हो जाती थी। हालांकि उस समय आमदनी कम से कम दोपहर तक (तीन-चार रुपये) हो जाती थी, लेकिन काम लगातार चलता रहता था। वहीं आज महंगाई के दौर में भी दोपहर एक बजे तक मात्र एक हजार रुपये की ही बिक्री हो पाई है, जो चिंता का विषय है।
कुम्हार समुदाय के इन लोगों ने बताया कि अब वे खुद बर्तन बनाने के बजाय पंजाब से मिट्टी के बर्तन मंगवाने को मजबूर हैं। उन्होंने बताया कि इस बार उन्होंने करीब 60 हजार रुपये के बर्तन खरीदे हैं, लेकिन बिक्री की धीमी रफ्तार को देखते हुए उन्हें आशंका है कि लागत भी पूरी नहीं हो पाएगी।
उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि अब कुम्हार जाति केवल नाम मात्र रह गई है और आने वाली पीढ़ियां शायद यह भी नहीं जान पाएंगी कि कभी कुम्हार अपने हाथों से मिट्टी के बर्तन बनाया करते थे।

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