टूट गई सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा, माता भरमाणी के गुरों की भविष्यवाणी हुई सच,श्री मणिमहेश यात्रा में नहीं हो सका ‘डल तोड़ने’ का अनुष्ठान

टूट गई सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा, माता भरमाणी के गुरों की भविष्यवाणी हुई सच,श्री मणिमहेश यात्रा में नहीं हो सका ‘डल तोड़ने’ का अनुष्ठान 


( चंबा जितेन्द्र खन्ना )

हिमाचल प्रदेश के चंबा ज़िले में आई भीषण प्राकृतिक आपदा ने जहां जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है, वहीं सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं पर भी गहरी चोट पहुंचाई है। ऐतिहासिक और आस्था से जुड़े श्री मणिमहेश यात्रा का समापन इस बार अधूरा रह गया। पहली बार ‘डल तोड़ने’ की पवित्र रस्म पूरी नहीं हो सकी।

परंपरा का महत्व

मणिमहेश यात्रा की पूर्णाहुति ‘डल तोड़ने’ की रस्म के साथ होती है। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है, जिसके अंतर्गत भरमौर उपमंडल के सांचूई गांव के शिव चेलों का डल झील तक पहुंचकर विधिवत स्नान करता है। इस स्नान के बाद ही मणिमहेश झील को आम श्रद्धालुओं के लिए वर्षभर के लिए बंद माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि जब तक यह अनुष्ठान न हो, यात्रा अधूरी मानी जाती है।

आपदा के कारण बाधा

इस बार भारी बारिश और भूस्खलन ने पूरे क्षेत्र का स्वरूप ही बदल दिया। चंबा-भरमौर राष्ट्रीय राजमार्ग कई जगहों से ध्वस्त हो गया। मलबा और पत्थरों के ढेर ने यात्रा मार्ग को पूरी तरह अवरुद्ध कर दिया। यहां तक कि पैदल जाने वाले रास्ते भी पूरी तरह ध्वस्त हो गए। परिणामस्वरूप, सांचूई गांव से रवाना हुए शिव चेलों का डल झील तक पहुंचने में असमर्थ रहा।

श्रद्धालुओं में निराशा

श्रद्धालुओं और स्थानीय निवासियों के लिए यह बेहद भावनात्मक झटका है। उनका कहना है कि मणिमहेश डल में ‘डल तोड़ने’ की रस्म केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा है। इस रस्म के साथ हजारों वर्षों से यात्रा का समापन होता आ रहा है। पहली बार इस परंपरा के टूटने से श्रद्धालु भारी मन से लौटे।

प्रशासन और स्थानीयों की चिंता

लोगों ने प्रशासन से आग्रह किया कि ऐसी परिस्थितियां दोबारा न बनें, इसके लिए ठोस कदम उठाए जाएं। वहीं स्थानीय पुजारियों और श्रद्धालुओं ने मिलकर गांव स्तर पर पूजा-अर्चना कर भगवान शिव से क्षमा प्रार्थना की। उनका कहना है कि परिस्थितियां चाहे जितनी भी कठिन क्यों न हों, यह परंपरा भविष्य में जीवित रहनी चाहिए।

नतीजा

इस बार की मणिमहेश यात्रा इतिहास के पन्नों में एक अधूरी और दुखद याद के रूप में दर्ज हो गई। श्रद्धालु और स्थानीय लोग इसे भगवान शिव की इच्छा मानकर स्वीकार कर रहे हैं, लेकिन सभी के मन में यह टीस बरकरार है कि सदियों पुरानी परंपरा प्राकृतिक आपदा की भेंट चढ़ गई।

गौरतलब हो माता भरमाणी जी के गुरों ने पहले ही भविष्यवाणी कर दी थी वो सच हुई 

राधाष्टमी के पावन अवसर पर संचुई गांव के चेलों के सदियों पुरानी परंपरा डल तोडने की परंपरा का इस वर्ष निर्वाहन नहीं हो पाया है। पुलिस की सुरक्षा के बीच डल तोडने के लिए मणिमहेश रवाना चेले हडसर से आगे रास्ते क्षतिग्रस्त होने के चलते वापिस लौट आए हैं।

उल्लेखनीय है कि मणिमहेश यात्रा का इस रस्म का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व बेहद गहरा है। मान्यता है कि राधाष्टमी के दिन संचुई के चेलों द्धारा झील में पूजा-अर्चना के साथ डल तोडने की रस्म पूरी किए जाने के बाद ही शाही स्नान का दौर आरंभ होता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। यह परंपरा हर परिस्थिति में निभाई जाती रही है। मगर इस बार खराब मौसम के चलते यह परंपरा पूरी नहीं हो पाई है।

उल्लेखनीय है कि इस बार बारिश से बरपे कहर के चलते मणिमहेश यात्रा पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। मणिमहेश यात्रा पर आए श्रद्धालुओं को वापिस घर भेजा जा रहा है। मगर सरकार व प्रशासन द्धारा मणिमहेश यात्रा की सदियों पुरानी संचुई के चेलों द्धारा पवित्र डल को तोडने की रस्म को पूरा करवाने के लिए गत रोज पुलिस टीम संग संचुई के चेलों को मणिमहेश रवाना किया गया था। मगर हडसर से आगे रास्ता बुरी तरह क्षतिग्रस्त होने के चलते यह सभी वापिस लौट आए हैं।

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