ओ पी एस को वित्तीय संकट की ढाल बनाना बंद करे सरकार सवा लाख कर्मचारी दे रहे हैं जी पी एफ का साथ डॉ. संजीव गुलेरिया

 ओ पी एस को वित्तीय संकट की ढाल बनाना बंद करे सरकार सवा लाख कर्मचारी दे रहे हैं जी पी एफ का साथ डॉ. संजीव गुलेरिया


​ नूरपुर : विनय महाजन /

  नूरपुर न्यू पेंशन स्कीम रिटायर्ड कर्मचारी अधिकारी महासंघ एवं दस वर्ष से कम सेवाकाल वाले सेवानिवृत्त कर्मचारी अधिकारी महासंघ हिमाचल प्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. संजीव गुलेरिया ने आज यहाँ एक प्रैस विज्ञाप्ति मे वताया कि प्रदेश की वित्तीय स्थिति और पुरानी पेंशन योजना को लेकर चल रहे भ्रामक विमर्श पर कड़ा ऐतराज जताया। उन्होंने कहा कि सरकार अपनी वित्तीय विफलताओं और आर्थिक प्रबंधन की कमियों को छिपाने के लिए ओ पी एस को 'खलनायक' की तरह पेश कर रही है, जो कि तथ्यों से पूरी तरह परे है।डॉ. गुलेरिया ने आंकड़ों के साथ तर्क देते हुए कहा, "यह प्रचारित किया जा रहा है कि ओ पी एस से सरकार पर 1600 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ा है, लेकिन सच्चाई यह है कि ओ पी एस बहाल होने के बाद प्रदेश के सवा लाख कर्मचारी अपने वेतन से जी पी एफ (General Provident Fund) की भारी-भरकम कटौती करवा रहे हैं। यह सारा पैसा सीधे सरकार के पास जमा हो रहा है l इसे सरकार विकास कार्यों और पूंजीगत व्यय के लिए इस्तेमाल कर सकती है। कर्मचारी अपने हाथ में आने वाले वेतन में कटौती सह रहे हैं ताकि उनका भविष्य सुरक्षित रहे यह कर्मचारियों का बड़ा त्याग है।डॉ. गुलेरिया ने महत्वपूर्ण बिंदु उठाते हुए कहा कि एन पी एस के समय सरकार को हर कर्मचारी के मूल वेतन का 14% हिस्सा (Government Share) अपनी जेब से देना पड़ता था। ओ पी एस लागू होने के बाद अब सरकार को यह 14% राशि हर महीने नहीं देनी पड़ रही है। यह सरकार के लिए एक बहुत बड़ी नकद बचत है जिसे सार्वजनिक विमर्श में जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है।वित्तीय संकट और पेंशन के अंतर्संबंधों पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि विपक्ष और कुछ विश्लेषक ओ पी एस को आर्थिक बदहाली की वजह बताते हैं, लेकिन पंजाब का उदाहरण उनकी पोल खोलता है। पंजाब में पिछले दो वर्षों से महंगाई भत्ता नहीं दिया गया है, जबकि वहां अभी भी एन पी एस का ढांचा ही प्रभावी है। इससे यह पता चलता है कि आर्थिक संकट का असली कारण खराब आर्थिक प्रबंधन, बढ़ता कर्ज और फिजूलखर्ची है, न कि कर्मचारियों की पेंशन।अंत में डॉ. संजीव गुलेरिया ने सरकार को सुझाव दिया कि वह अपनी वित्तीय विफलताओं का ठीकरा पेंशन पर फोड़ने के बजाय अन्य कारणों पर ध्यान दें। उन्होंने कहा कि सरकार को बढ़ते कर्ज को कम करने, फिजूलखर्ची रोकने और राजस्व जुटाने के नए स्रोतों पर काम करना चाहिए, न कि उस हक पर हमला करना चाहिए जिसे एक कर्मचारी अपनी जिंदगी के 30-35 साल की सेवा के बदले कमाता है।

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