जिला परिषद चुनावों में “अधिकारिक उम्मीदवार” का दांव कहीं भाजपा के लिए आत्मघाती सिद्ध न हो जाए!
जिला परिषद चुनावों में “अधिकारिक उम्मीदवार” का दांव कहीं भाजपा के लिए आत्मघाती सिद्ध न हो जाए!
नूरपुर : विनय महाजन /
नूरपुर हिमाचल प्रदेश में जिला परिषद चुनावों को लेकर भारतीय जनता पार्टी जिस रणनीति के तहत “अधिकारिक उम्मीदवार” घोषित कर रही है, वह अब पार्टी के भीतर ही नए विवाद और असंतोष को जन्म देती दिखाई दे रही है। पंचायत और जिला परिषद जैसे स्थानीय चुनाव हमेशा से व्यक्ति विशेष की छवि, सामाजिक समीकरण, स्थानीय स्वीकार्यता और व्यक्तिगत संपर्कों पर आधारित रहे हैं। यहां चुनावी लड़ाई केवल पार्टी चिन्ह की नहीं, बल्कि गांव-गांव में बने रिश्तों, भरोसे और वर्षों की सामाजिक पकड़ की होती है। ऐसे में किसी एक उम्मीदवार को “अधिकारिक” घोषित करना कई नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए राजनीतिक अस्तित्व का प्रश्न बनता जा रहा है।नूरपुर, ज्वाली और फतेहपुर जैसे क्षेत्रों में भाजपा नेताओं के बीच चल रही खींचतान अब संगठनात्मक मतभेदों से आगे बढ़कर सार्वजनिक विवाद का रूप ले चुकी है। चुनावी सभाओं, प्रेस कॉन्फ्रेंस, सोशल मीडिया पर खुले आरोप-प्रत्यारोप, प्रेस बयानों के माध्यम से एक-दूसरे पर निशाना साधना और टिकट वितरण को लेकर खुली नाराजगी यह साबित कर रही है कि भाजपा के भीतर अंतर्कलह अब चरम पर पहुंच चुकी है। सबसे गंभीर बात यह है कि यह लड़ाई विपक्ष नहीं लड़ रहा, बल्कि भाजपा के अपने ही नेता एक-दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोले बैठे हैं।राजनीति में विरोधियों से ज्यादा नुकसान भीतरघात पहुंचाता है। जब कार्यकर्ता मन से साथ न हो, जब स्थानीय नेता खुद को अपमानित महसूस करने लगें और जब टिकट वितरण में पक्षपात की चर्चा गांव-गांव तक पहुंच जाए, तब चुनाव केवल औपचारिकता बनकर रह जाते हैं। जिला परिषद चुनावों में बूथ स्तर पर कार्यकर्ता ही असली ताकत होता है। यदि वही कार्यकर्ता निष्क्रिय हो जाए या भीतर ही भीतर विरोध करने लगे, तो बड़े से बड़ा संगठन भी धराशायी हो सकता है।भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि स्थानीय निकाय चुनावों में पार्टी का पारंपरिक वोट बैंक भी पूरी तरह “ट्रांसफर” नहीं होता। ग्रामीण मतदाता विधानसभा या लोकसभा चुनावों की तरह केवल पार्टी देखकर मतदान नहीं करता। वह उम्मीदवार का व्यवहार, उसके परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा, सुख-दुख में उसकी भागीदारी और गांव में उसकी स्वीकार्यता को प्राथमिकता देता है। यही कारण है कि कई बार निर्दलीय उम्मीदवार भी बड़े राजनीतिक दलों को कड़ी टक्कर दे देते हैं।आज भाजपा जिन क्षेत्रों में “अधिकारिक उम्मीदवार” घोषित कर रही है, वहां सबसे बड़ा खतरा बागियों का है। टिकट न मिलने से नाराज नेता खुलकर मैदान में उतर चुके हैं और वोटों का सीधा विभाजन होता दिखाई दे रहा है। हाल ही में हुए नगरपालिका और नगर पंचायत चुनावों के नतीजे भी भाजपा के लिए एक बड़ा राजनीतिक संकेत माने जा रहे हैं। पूरे कांगड़ा-चंबा संसदीय क्षेत्र में भाजपा को कई स्थानों पर करारी हार का सामना करना पड़ा। वैसे भी प्रदेश में भाजपा का शीर्ष नेतृत्व प्रदेश में भाजपा को एकजुट करने में नाकाम रहा है लेकिन मतदाताओं को यह जरूर कहा जा रहा है कि आने वाली सरकार बीजेपी की होगी जबकि सत्ता पक्ष चुनाव भी जनसभा में यह भाषण दे रहे हैं कि भाजपा मे कुर्सी के लिए लड़ाई लड़ी जा रही है पहले अपना घर देखें जो अपनी पार्टी की गुटबाजी को खत्म नहीं कर सकते प्रदेश मे जनता की सेवा क्या करेंगे?

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