जहां रक्तदान की संस्कृति है, वहां ब्लड बैंक का इंतज़ार क्यों?" कब जागेगी  व्यवस्था परिवर्तन सरकार

 जहां रक्तदान की संस्कृति है, वहां ब्लड बैंक का इंतज़ार क्यों?" कब जागेगी  व्यवस्था परिवर्तन सरकार


नूरपुर:-(विनय महाजन )

किसी भी सभ्य समाज की पहचान केवल उसकी ऊंची इमारतों, चौड़ी सड़कों या बड़ी विकास परियोजनाओं से नहीं होती।आज के दौर मे अस्पताल इसी संवेदनशीलता की सबसे बड़ी परीक्षा होते हैं, और वहां रक्त की उपलब्धता कई बार जीवन और मृत्यु के बीच की अंतिम कड़ी बन जाती है।रक्त एक ऐसी अमूल्य निधि है, जिसे न कोई उद्योग बना सकता है, न कोई मशीन तैयार कर सकती है और न ही किसी बाजार से खरीदा जा सकता है। यह केवल एक इंसान की संवेदना से दूसरे इंसान तक पहुंचता है। इसलिए रक्तदान को महादान कहा जाता है, क्योंकि इसमें किसी का जीवन बचाने की निस्वार्थ भावना शामिल होती है।नूरपुर का सामाजिक परिवेश इस दृष्टि से हमेशा प्रेरणादायक रहा है। वर्ष 2015 में स्थापित नूरपुर ब्लड डोनर्स क्लब ने रक्तदान को एक जनआंदोलन का स्वरूप देने का प्रयास किया। वर्षों से संस्था के स्वयंसेवक दिन हो या रात, किसी दुर्घटना का शिकार व्यक्ति हो, किसी प्रसूता को रक्त की आवश्यकता हो या किसी गंभीर मरीज का ऑपरेशन चेतना का प्रमाण है।इसी चेतना के साथ संस्था ने एक और सपना देखा—सिविल अस्पताल नूरपुर में ब्लड बैंक की स्थापना का। पिछले एक दशक में इस मांग को लेकर अनेक प्रयास किए गए।अलग-अलग समय पर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों, स्वास्थ्य मंत्रियों, स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के समक्ष यह विषय गंभीरता से रखा गया।इस मामले मे  ज्ञापन भी  दिए गए परिणाम में सिर्फ आश्वासन मिले और सकारात्मक संकेत भी मिले। लेकिन समय बीतता गया और ब्लड बैंक आज भी प्रतीक्षा का विषय बना हुआ है। प्रदेश की  सरकार व्यवस्था परिवर्तन करने आई है लेकिन 3 साल से अधिक  का समय हो गया मरीजों  के लिए नूरपुर के सिविल नागरिक अस्पताल में ब्लड बैंक की स्थापना आज तक नही  हो सकी l इतना ही नहीं सिविल नागरिक अस्पताल नूरपुर की रोग कल्याण समिति की बैठक में भी ब्लड बैंक स्थापना का मुद्दा कई बार उठा लेकिन धरातल पर कोई कार्रवाई नहीं आखिरकार क्यों?ब्लड बैंक का अभाव केवल एक प्रशासनिक कमी नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर मरीजों, उनके परिजनों और रक्तदाताओं पर पड़ता है। आज नूरपुर के रक्तदाताओं को रक्तदान करने के लिए लगभग 70 किलोमीटर दूर टांडा मेडिकल कॉलेज या धर्मशाला तथा कई बार 35 किलोमीटर दूर पंजाब के पठानकोट जाना पड़ता है। इसके  बावजूद रक्तदाता बिना किसी शिकायत के मानवता का अपना धर्म निभाते हैं।कठिनाई यहीं समाप्त नहीं होती। जब किसी मरीज के लिए पठानकोट के सिविल अस्पताल से रक्त लाया जाता है, तो लगभग 1100 रुपये हैंडलिंग शुल्क देना पड़ता है। यदि किसी निजी ब्लड बैंक से रक्त लेना पड़े, तो यह राशि लगभग 1800 रुपये तक पहुंच जाती है। ऐसे समय में मरीज का परिवार पहले ही बीमारी और मानसिक तनाव से जूझ रहा होता है, ऊपर से यह अतिरिक्त आर्थिक बोझ उसकी परेशानी और बढ़ा देता है। यदि सिविल अस्पताल नूरपुर में ब्लड बैंक स्थापित हो जाए, तो न केवल रक्तदाताओं का समय और खर्च बचेगा, बल्कि मरीजों और उनके परिजनों को भी अनावश्यक आर्थिक भार से राहत मिलेगी। जिस दिन सिविल अस्पताल नूरपुर में ब्लड बैंक स्थापित होगा, उस दिन केवल एक नई सुविधा शुरू नहीं होगी, बल्कि हजारों परिवारों का समय बचेगा, उनका आर्थिक बोझ कम होगा l इस मामले मे नूरपुर ब्लड डोनर्स क्लब के प्रधान राजीव पठानिया ने एक भेंट वार्ता में स्पष्ट तौर पर कहां है कि हमारा क्लब काफ़ी वर्षो से समाज सेवा निस्वार्थ कर रहा है अगर सिविल नागरिक अस्पताल में सरकार एक ब्लड बैंक की स्थापना कर देती हैं तो क्षेत्र के किसी भी रोगी को पंजाब या अन्य स्थान पर रक्त के लिए नही जाना पड़ेगाl इसे नूरपुर आवाम की वद किस्मती समझी जाए जिन्होंने एकजुट होकर किस मामले में कभी संघर्ष नहीं किया यह कारण है कि  नूरपुर  आज  विकास के नजरिये  से काफी उजड़ रहा है l

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