रिकांगपिओ: कचरे से संसाधन की यात्रा, स्वच्छता का एक नया अध्याय

 रिकांगपिओ: कचरे से संसाधन की यात्रा, स्वच्छता का एक नया अध्याय


जनजातीय जिले किन्नौर का मुख्यालय रिकांगपिओ, हिमाचल प्रदेश सरकार के "स्वच्छ हिमाचल - स्वच्छ राष्ट्र" के संकल्प को साकार करने की दिशा में एक प्रेरणादायक उदाहरण पेश कर रहा है। यहाँ कचरा प्रबंधन को सिर्फ एक चुनौती नहीं, बल्कि एक अवसर के रूप में देखा जा रहा है। विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण (साडा) के नेतृत्व में, यह क्षेत्र कचरे को संसाधन में बदलकर, स्वच्छता और आर्थिक स्थिरता का एक नया मॉडल स्थापित कर रहा है।

कचरा प्रबंधन की ठोस पहल

रिकांगपिओ में साडा ने एक प्रभावी ठोस अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली विकसित की है। यह क्षेत्र 19 उप-मोहल और 7 ग्राम पंचायतों तक फैला है, जहाँ लगभग 7,850 घर, सरकारी कार्यालय और व्यापारिक प्रतिष्ठान हैं। यहाँ की स्थायी आबादी लगभग 12,997 है, लेकिन 15,000-20,000 प्रवासी मजदूर और कर्मचारियों की उपस्थिति से कचरे का उत्पादन बढ़ जाता है। इन चुनौतियों के बावजूद, साडा द्वारा प्रतिदिन 1 से 1.5 टन कचरे का सफल प्रबंधन किया जा रहा है।

डोर-टू-डोर कलेक्शन: रिकांगपिओ में 80-90% कचरे का संग्रह डोर-टू-डोर प्रणाली से किया जाता है। इसमें हीलिंग हिमालयाज फाउंडेशन और अन्य स्वयंसेवी संगठन सक्रिय रूप से सहयोग करते हैं। यह प्रणाली कचरे के प्रभावी संग्रह के साथ-साथ लोगों में जागरूकता भी बढ़ा रही है।

सुरक्षित परिवहन: एकत्र किए गए कचरे को ढके हुए वाहनों, जैसे कि 3 पिकअप और 1 डंपर, के माध्यम से सुरक्षित रूप से पोवारी स्थित संयंत्र तक पहुँचाया जाता है।

पोवारी प्लांट: कचरे को राजस्व में बदलने का केंद्र

साडा ने पोवारी में एक ठोस अपशिष्ट प्रबंधन संयंत्र और सामग्री पुनर्प्राप्ति सुविधा (MRF) स्थापित की है। यह सुविधा कचरे के प्रबंधन में एक गेम-चेंजर साबित हो रही है। यहाँ लाए गए कचरे की छंटाई कर उसे पुनर्चक्रण योग्य (recyclable) और गैर-पुनर्चक्रण योग्य (non-recyclable) श्रेणियों में अलग किया जाता है।

अप्रैल से अगस्त 2025 के बीच, इस प्लांट तक 25.95 टन कचरा पहुँचा। इसमें से 23.91 टन कचरे का प्रसंस्करण किया गया और 17.71 टन पुनर्चक्रण योग्य सामग्री, जैसे काँच, गत्ता, कपड़ा, प्लास्टिक और धातु, को सफलतापूर्वक बेचा गया। इस बिक्री से न केवल पर्यावरण का बोझ कम हुआ, बल्कि राजस्व भी उत्पन्न हुआ, जिससे यह सिद्ध हुआ कि कचरा प्रबंधन आर्थिक रूप से भी फायदेमंद हो सकता है।

प्लास्टिक, ई-कचरा और स्थायी समाधान

साडा की यह पहल सिर्फ सामान्य कचरे तक सीमित नहीं है। वे प्लास्टिक और ई-कचरे जैसी विशेष श्रेणियों पर भी ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।

  प्लास्टिक प्रबंधन: पोवारी प्लांट में प्रतिदिन 80-100 किलो प्लास्टिक एकत्र और भंडारित किया जाता है ताकि उसे पुनर्चक्रण के लिए भेजा जा सके।

  ई-कचरा केंद्र: आधुनिक अपशिष्ट प्रबंधन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, साडा ने ई-कचरे के लिए एक अलग केंद्र स्थापित किया है।

  गैर-पुनर्चक्रण योग्य कचरे का निपटान: थर्माकोल और कम मूल्य वाले प्लास्टिक जैसे कचरे, जिन्हें बेचना संभव नहीं है, के लिए साडा ने शिमला नगर निगम को एक प्रस्ताव भेजा है। इसके तहत, इस कचरे को शिमला के भरियाल (टूटू) स्थित वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट में 500 रुपये प्रति टन की दर से निपटाने की योजना है। यह स्थायी निपटान व्यवस्था की दिशा में एक सराहनीय पहल है।

चुनौतियाँ और भविष्य की राह

जिलाधीश किन्नौर, डॉ. अमित कुमार शर्मा ने स्वीकार किया कि रिकांगपिओ में शहरी स्थानीय निकाय (यू.एल.बी) की अनुपस्थिति से प्रशासनिक और परिचालन स्तर पर कुछ कठिनाइयाँ आती हैं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए योजना बनाई जा रही है। इसके अलावा, सीसीटीवी कैमरों की मदद से कचरा प्रबंधन को और मजबूत किया गया है।

अन्य चुनौतियों में पंचायतों द्वारा अनियोजित कचरा शेड बनाना, मिश्रित कचरे की समस्या, आवारा पशुओं का कचरे के ढेर में घूमना और पुराने डंपिंग स्थानों का फिर से उपयोग में आना शामिल है। प्रशासन इन समस्याओं के स्थायी समाधान के लिए एक प्रभावी नीति तैयार करने पर काम कर रहा है।

कुल मिलाकर, रिकांगपिओ की कचरा प्रबंधन पहल यह दर्शाती है कि दृढ़ इच्छाशक्ति और सामुदायिक सहयोग से, दुर्गम और संवेदनशील भौगोलिक क्षेत्रों में भी स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण के लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है। यह प्रयास हिमाचल प्रदेश को एक स्वच्छ और हरित राज्य बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो रहा है।


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