जब मौन कन्या बनीं कुलदेवी: टौणी देवी माता की अद्भुत गाथा

 जब मौन कन्या बनीं कुलदेवी: टौणी देवी माता की अद्भुत गाथा 


  
                                                                                हिमाचल प्रदेश की देवभूमि में शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो, जहां किसी मंदिर के साथ केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि इतिहास, लोकविश्वास, त्याग और किसी परिवार की पीढ़ियों पुरानी स्मृतियां भी जुड़ी हों। हमीरपुर जिले की पहाड़ियों पर स्थित माता टौणी देवी का मंदिर ऐसा ही एक आस्था-स्थल है। आज माता टौणी देवी को चौहान राजपूतों की कुलदेवी के रूप में विशेष श्रद्धा प्राप्त है। मान्यता है कि चौहान वंश का कोई भी शुभ कार्य माता का आशीर्वाद लिए बिना पूर्ण नहीं माना जाता। हिमाचल के अतिरिक्त पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान और जम्मू-कश्मीर तक बसे चौहान परिवार भी माता के दरबार से अपनी आस्था जोड़ते हैं। लेकिन इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता केवल यह नहीं है कि यहां हजारों लोग माथा टेकते हैं। इसकी पहचान उस अनूठी परंपरा से भी है, जिसमें भक्त अपनी मनोकामना व्यक्त करने के लिए दो पत्थरों को आपस में टकराते हैं। इसके पीछे माता टौणी देवी की एक मार्मिक लोकगाथा जुड़ी हुई है। स्थानीय परंपरा के अनुसार, लगभग तीन से साढ़े तीन सौ वर्ष पहले दिल्ली और मैदानी क्षेत्रों में राजनीतिक परिस्थितियां बदल रही थीं। लोककथा के अनुसार, उस समय मुगल सत्ता के दबाव और धार्मिक असुरक्षा के वातावरण में चौहान वंश के बारह भाई अपने परिवार तथा धर्म की रक्षा के लिए पहाड़ों की ओर चले आए। उनके साथ उनकी एक बहन भी थी, जो सुन नहीं सकती थी। पहाड़ियों में पहुंचने के बाद परिवार ने एक सुरक्षित स्थान पर बसने का निर्णय लिया। लोकमान्यता के अनुसार उन्होंने बाकर, कुनाह और पुंग खड्ड के आसपास अपना नया बसेरा बनाने की योजना बनाई। यहीं से कहानी एक रहस्यमय मोड़ लेती है। कहा जाता है कि जिस स्थान पर भवन की नींव रखने का प्रयास किया गया, वहां से अचानक खून जैसी लाल धारा निकलने लगी। यह देखकर परिवार के लोग भयभीत हो गए। समस्या का समाधान जानने के लिए परिवार ने अपने कुल पुरोहित से सलाह ली। लोककथा के अनुसार पुरोहित ने परिवार की अविवाहित कन्या को इस घटना के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया। परिवार की महिलाओं ने भी संदेह की दृष्टि से उसी कन्या को देखना शुरू कर दिया। जिस बहन को सुनाई नहीं देता था, वह स्वयं के पक्ष में कुछ कह भी नहीं सकती थी। यही इस कथा का सबसे मार्मिक पक्ष है—जिसके पास अपनी बात कहने के लिए आवाज नहीं थी, वही आगे चलकर उस क्षेत्र की सबसे बड़ी शक्ति के रूप में पूजी जाने लगी। लोकमान्यता के अनुसार, परिवार के आरोपों से आहत होकर वह कन्या उस स्थान पर चली गई जहां आज माता टौणी देवी का मंदिर स्थित है। उसने वहां बैठकर घोर तपस्या प्रारंभ कर दी। दिन बीतते गए। परिवार को धीरे-धीरे अपनी भूल का अहसास होने लगा। कहा जाता है कि आषाढ़ मास की दसवीं तिथि को वह कन्या अचानक वहां से अंतर्ध्यान हो गई। परिवार के लिए यह घटना किसी चमत्कार से कम नहीं थी। जिस कन्या को कभी अशुभ मान लिया गया था, वही उनके लिए देवीस्वरूप बन चुकी थी। इसी घटना की स्मृति में उसके भाइयों ने वहां एक छोटा-सा मंदिर स्थापित किया। समय के साथ यही छोटा-सा देवस्थान आज के प्रसिद्ध माता टौणी देवी मंदिर के रूप में विकसित हुआ। टौणी देवी मंदिर की सबसे अनोखी परंपरा यहां की पूजा-पद्धति है। मान्यता है कि माता अपने मानव जीवन में सुन नहीं सकती थीं। इसी लोकविश्वास के कारण यहां भक्त पारंपरिक रूप से केवल घंटी बजाकर अपनी मनोकामना व्यक्त करने के बजाय माता की पिंडी के समीप रखे दो पत्थरों को आपस में टकराते हैं। भक्तों की श्रद्धा है कि पत्थरों के टकराने से उत्पन्न आवाज माता तक पहुंचती है और वह अपने भक्तों की मनोकामना सुन लेती हैं। यही कारण है कि दो पत्थरों के टकराने की आवाज आज टौणी देवी मंदिर की पहचान बन चुकी है। यह परंपरा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि उस लोककथा की स्मृति भी है जिसमें एक ऐसी कन्या, जो स्वयं सुन नहीं सकती थी, आज लाखों लोगों की मनोकामनाएं सुनने वाली देवी के रूप में पूजी जाती है। माता टौणी देवी का महत्व स्थानीय मंदिर तक सीमित नहीं है। उन्हें विशेष रूप से चौहान राजपूत समाज की कुलदेवी माना जाता है। कुलदेवी की परंपरा भारतीय समाज में केवल धार्मिक विश्वास नहीं होती। यह परिवार, वंश, पूर्वजों और अपनी सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी एक भावनात्मक परंपरा भी होती है। इसीलिए चौहान परिवारों में विवाह, संतान, गृहप्रवेश या अन्य शुभ अवसरों से पहले माता का स्मरण करने और मंदिर में शीश नवाने की परंपरा आज भी देखी जाती है। माता के दरबार में हिमाचल के अलावा पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान और जम्मू-कश्मीर से भी श्रद्धालुओं के आने का उल्लेख मिलता है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि चौहान परिवारों के प्रवास के साथ माता की आस्था भी विभिन्न क्षेत्रों तक पहुंचती गई। माता टौणी देवी के मंदिर में वर्ष भर श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन आषाढ़ मास का मेला विशेष महत्व रखता है। स्थानीय परंपरा में यह मेला माता के अंतर्ध्यान होने की कथा से भी जोड़ा जाता है। मेले के दौरान आसपास के गांवों के अलावा दूर-दराज से श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं। ढोल-नगाड़ों, पारंपरिक वाद्य यंत्रों, भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठानों के बीच पूरा क्षेत्र भक्तिमय हो उठता है। टौणी देवी की पूरी गाथा को यदि एक वाक्य में समझना हो तो शायद यही कहा जा सकता है— “जिस कन्या के पास अपनी बात कहने के लिए आवाज नहीं थी, आज उसी के दरबार में लोग अपनी मनोकामनाएं लेकर आते हैं।” यह कथा केवल चमत्कार की कहानी नहीं है। इसके भीतर परिवार, विस्थापन, पीड़ा, संदेह, तपस्या, पश्चाताप और आस्था के कई रंग दिखाई देते हैं। एक ऐसी कन्या, जिसे कभी परिवार की विपत्ति का कारण समझा गया, लोकविश्वास में आगे चलकर रक्षक देवी बन गई। उसके नाम पर मंदिर बना, उसकी स्मृति कुलदेवी के रूप में स्थापित हुई और सदियों बाद भी भक्त उसके दरबार में अपनी मनोकामना लेकर पहुंचते हैं। आज जब टौणी देवी के मंदिर में दो पत्थरों के टकराने की आवाज गूंजती है, तो वह केवल पत्थरों की आवाज नहीं होती। श्रद्धालुओं के लिए वह उस मौन देवी तक पहुंचने वाली आस्था की आवाज है। “वह देवी, जो स्वयं मौन थीं, आज अपने भक्तों की हर पुकार सुनने वाली माता के रूप में पूजी जाती हैं।”                                                                                                                                                लेखक:  राजन कुमार शर्मा

गांव डुगली, उप तहसील लंबलू,
जिला हमीरपुर हिमाचल प्रदेश-177029

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