नूरपुर के मातृ शिशु अस्पताल पर सरकार की चुप्पी क्यों?
नूरपुर के मातृ शिशु अस्पताल पर सरकार की चुप्पी क्यों?
राकेश शर्मा जसूर
किसी क्षेत्र के लिए इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि अस्पताल की इमारत तैयार हो, उसका उद्घाटन भी हो जाए और वर्षों बाद भी जनता उसकी स्वास्थ्य सुविधा का इंतजार करती रहे। नूरपुर का 50 बिस्तरों वाला मातृ-शिशु अस्पताल आज इसी सवाल के सामने खड़ा है। हिमाचल में मातृ-शिशु स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए ऐसे अस्पताल केवल चार स्थानों पर बने हैं। इनमें तीन मेडिकल कॉलेजों में हैं, जबकि नूरपुर में यह सुविधा सिविल अस्पताल परिसर में तत्कालीन मंत्री राकेश पठानिया के प्रयासों से स्थापित हुई। इसके बावजूद आज 2026 में भी यह अस्पताल पूरी तरह शुरू नहीं हो पाया है। सवाल अब यह नहीं कि अस्पताल क्यों बनाया गया, बल्कि यह है कि बनकर तैयार हो जाने के बाद भी इसे शुरू करने में आखिर इतनी देर क्यों हो रही है?
अस्पताल को जल्द शुरू करवाने की मांग को लेकर रंजीत बक्शी जनकल्याण फाउंडेशन के निदेशक अकिल बक्शी अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे हैं और आज उनकी भूख हड़ताल का 6वाँ दिन है। उनकी मांग को समझने की जरूरत है। वे सरकार से कोई असंभव वादा नहीं मांग रहे। वे केवल यह चाहते हैं कि सरकार का कोई बड़ा और जिम्मेदार अधिकारी या मंत्री सामने आए और स्पष्ट रूप से बताए कि नूरपुर का मातृ-शिशु अस्पताल किस निश्चित तारीख तक शुरू कर दिया जाएगा। यदि सरकार के पास अस्पताल शुरू करने की कार्ययोजना है तो तारीख बताने में कठिनाई क्यों होनी चाहिए? और यदि कोई बाधा है तो उसे सार्वजनिक करने में संकोच क्यों?
ऐसे में सरकार और स्वास्थ्य विभाग से आग्रह है कि इस भूख हड़ताल को केवल एक आंदोलन मानकर नजरअंदाज न किया जाए। संबंधित मंत्री, विभाग के प्रधान सचिव, स्वास्थ्य निदेशक अथवा सरकार का कोई सक्षम और जिम्मेदार अधिकारी अकिल बक्शी से तत्काल संवाद करे, अस्पताल की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करे और एक निश्चित समय-सीमा की सार्वजनिक घोषणा करे। यदि सरकार कहती है कि अस्पताल अमुक तारीख से पहले पूरी तरह शुरू हो जाएगा, तो अकिल बक्शी के पास अपनी भूख हड़ताल समाप्त करने का एक ठोस आधार होगा। लोकतंत्र में आंदोलन का समाधान केवल पुलिस या प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि संवाद और स्पष्ट आश्वासन से भी निकाला जा सकता है।
यह मामला किसी व्यक्ति, संगठन या राजनीतिक दल की जीत-हार का नहीं होना चाहिए। यदि अस्पताल के निर्माण के पीछे राकेश पठानिया के प्रयास रहे हैं तो उसका श्रेय उन्हें मिलना चाहिए और यदि वर्तमान विधायक या अन्य जनप्रतिनिधियों ने इसे शुरू करवाने के लिए सरकार के समक्ष मामला उठाया है तो उसका भी उल्लेख होना चाहिए। लेकिन इन सबके ऊपर जनता का हित है। अस्पताल किसके प्रयासों से बना, इसका राजनीतिक हिसाब बाद में भी हो सकता है; फिलहाल सवाल यह है कि मां और बच्चे को इस अस्पताल की सुविधा कब मिलेगी। अस्पताल किसी राजनीतिक दल का कार्यालय नहीं, जनता के करों और सरकारी संसाधनों से बनी सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधा है।
सरकार को अब अस्पताल की पूरी स्थिति जनता के सामने रखनी चाहिए। कितने पद स्वीकृत हैं, कितने भरे गए हैं, कितने रिक्त हैं, किन डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मचारियों की जरूरत है, आवश्यक उपकरण उपलब्ध हैं या नहीं और यदि कोई प्रशासनिक, वित्तीय या तकनीकी अड़चन है तो वह क्या है—इन सभी सवालों के स्पष्ट जवाब मिलने चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ‘शीघ्र’, ‘जल्द’ या ‘बहुत जल्द’ जैसे शब्दों से आगे बढ़कर एक निश्चित तारीख बताई जाए। क्योंकि वर्षों से इंतजार कर रही जनता के लिए अब आश्वासन की नहीं, समय-सीमा की जरूरत है।
जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी इस मामले में महत्वपूर्ण है, लेकिन अस्पताल को संचालित करने की अंतिम जिम्मेदारी सरकार और स्वास्थ्य विभाग की है। विधानसभा में सवाल उठाना, सरकार के समक्ष मामला रखना और जनता की आवाज बनना जरूरी है, लेकिन उसके बाद आवश्यक पद स्वीकृत करना, नियुक्तियां करना, उपकरण उपलब्ध करवाना और सेवाएं शुरू करना शासन की जिम्मेदारी है। इसलिए इस समय राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से अधिक जरूरी है कि सरकार स्वयं आगे आए और बताए कि नूरपुर के इस अस्पताल को पूरी क्षमता से शुरू करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं और इसे कब तक शुरू किया जाएगा।
नूरपुर की जनता को भी यह समझना होगा कि यह किसी एक व्यक्ति या परिवार की समस्या नहीं है। आज किसी महिला को प्रसव के लिए, किसी नवजात को उपचार के लिए या किसी परिवार को आपात स्थिति में इस सुविधा की आवश्यकता हो सकती है। इसलिए अस्पताल शुरू करने की मांग को राजनीति से ऊपर रखकर देखा जाना चाहिए। अकिल बक्शी का आंदोलन सही है या गलत, इस बहस में उलझने के बजाय सरकार के लिए अधिक उपयोगी सवाल यह होना चाहिए कि क्या बातचीत के जरिए इस आंदोलन को समाप्त करवाने और अस्पताल शुरू करने की दिशा में ठोस कदम उठाया जा सकता है?
अब सरकार से यही आग्रह है7 कि वह इस मामले में और चुप्पी न साधे। कोई वरिष्ठ मंत्री या जिम्मेदार अधिकारी तत्काल अकिल बक्शी से बातचीत करे, अस्पताल की स्थिति स्पष्ट करे और एक निश्चित समय-सीमा की घोषणा करे। यदि सरकार के अनुसार अस्पताल अमुक तारीख तक शुरू हो सकता है तो वही बात सार्वजनिक रूप से कह दी जाए। इससे न केवल आंदोलन समाप्त करवाने का रास्ता खुलेगा, बल्कि जनता का भरोसा भी बढ़ेगा। अकिल बक्शी आखिर मांग भी क्या रहे हैं—सिर्फ इतना कि सरकार का कोई जिम्मेदार व्यक्ति सामने आए और भरोसे के साथ कहे कि नूरपुर का मातृ-शिशु अस्पताल इस तारीख तक शुरू हो जाएगा। अब यह छोटी-सी मांग पूरी करना सरकार के लिए कितना कठिन है, यह सवाल नूरपुर की जनता सरकार से पूछ रही है।
अस्पताल बन चुका है, उद्घाटन हो चुका है और इंतजार भी वर्षों का हो चुका है। अब जरूरत केवल एक स्पष्ट निर्णय की है—तारीख बताइए और अस्पताल शुरू कीजिए।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें