चैत्र मास में शुरू होने वाले नव संवत का संदेश गायन द्वारा देते हैं इस परंपरा से पीछे हट रही नई पीढ़ी
चैत्र मास में शुरू होने वाले नव संवत का संदेश गायन द्वारा देते हैं इस परंपरा से पीछे हट रही नई पीढ़ी
नूरपुर : विनय महाजन /
नूरपुर सदियों पुरानी लोक परंपरा को आज भी जीवित रखे हुए लोक गायक चैत्र मास के आगमन के साथ क्षेत्र में नव संवत (हिंदू नव वर्ष) का संदेश अपने पारंपरिक गायन के माध्यम से दे रहे हैं। ये गायक जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती बिलावर क्षेत्र से आने वाले ये गायक हर वर्ष कांगड़ा जिला के विशेषकर नूरपुर, ज्वाली और फतेहपुर क्षेत्रों में पहुंचते हैं और घर-घर जाकर लोकगीतों के जरिए नव वर्ष का स्वागत संदेश सुनाते हैं।स्थानीय भाषा में ‘डोलरू वाले’ के नाम से प्रसिद्ध ये गायक छोटी ढोलक के साथ पारंपरिक धुनों पर गायन करते हैं। उनकी मान्यता है कि चैत्र मास वही समय है जब सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा ने सृजन कार्य आरंभ किया था, इसलिए इस माह का विशेष महत्व है।गांवों में लोग इन गायकों का गर्मजोशी से स्वागत करते हैं और बदले में उन्हें वस्त्र, अन्न, गुड़, चीनी व अन्य भेंट स्वरूप प्रदान करते हैं। यह परंपरा सामाजिक और सांस्कृतिक जुड़ाव का प्रतीक रही है।हालांकि, समय के साथ इस परंपरा में गिरावट देखने को मिल रही है। पहले जहां बड़ी संख्या में लोक गायक इस परंपरा को निभाने आते थे वहीं अब उनकी संख्या काफी कम हो गई है। नई पीढ़ी का इस ओर कम रुझान चिंता का विषय बनता जा रहा है, जिससे आने वाले वर्षों में इस अनमोल सांस्कृतिकlश धरोहर के विलुप्त होने की आशंका भी जताई जा रही है। अपनी प्राचीन संस्कृति को यह पीढ़ी कायम रखें हुई है लेकिन नई पीढ़ी का पता नहीं की क्या वह इस परंपरा को कायम रख सकेगी ऐसे अनेक को प्रश्न पहाड़ी संस्कृति को लेकर जनसमूह में चर्चित है l
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