क्षेत्र में 6 दिन हुई भूख हड़ताल के समापन पर अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार संघ के निदेशक राजेश सिंह पठानिया ने उठाए अनेको सवाल
क्षेत्र में 6 दिन हुई भूख हड़ताल के समापन पर अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार संघ के निदेशक राजेश सिंह पठानिया ने उठाए अनेको सवाल
(नूरपुर:-विनय महाजन)
नूरपुर मे जनता की भावनाओं से खिलवाड़ करने की राजनीति चमकाने का फैशनu शायद नूरपुर में पहली बार देखने को मिलाl भोली-भाली जनता को गुमराह करना व उन्हें झूठे सब्जबाग दिखाना और उनकी भावनाओं का सहारा लेकर राजनीति में अपनी जगह बनाने की कोशिश करना आजकल की राजनीती मे एक फैशन का युग बनता जा रहा है आखिरकार राजनीति में किस प्रकार की गिरावट आ गई है ऐसी चर्चा इन नूरपुर विधानसभा क्षेत्र में चर्चित है l यह जानकारी एक प्रेस नोट में अंतरराष्ट्रीय मानव अधिकार महासंघ के निदेशक राजेश पठानिया ने देते हुए बताया कि बदलाव के नाम पर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं लेकिन जब उन दावों को निभाने की बारी आती है तो तस्वीर कुछ और ही नजर आती है। पहले कहते हैं हम भूख हड़ताल में सियासी राजनीति करना हमारा मकसद नहीं हैl ये किस्सा है नूरपुर में सिविल अस्पताल और मातृ-शिशु अस्पताल को लेकर 6 दिनों तक चली भूख हड़ताल के समापन को लेकर अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार संघ के निदेशक राजेश सिंह पठानिया ने ऐसे अनेको सवाल उठाते हुए कहा कि जनता की भावनाओं से जुड़े मुद्दों पर आंदोलन करने वालों को अपने दावों और वादों के प्रति जवाबदेह भी होना चाहिए।राजेश सिंह पठानिया ने कहा कि इतिहास गवाह है कि समाज, राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए महापुरुषों ने अपने प्राणों तक का बलिदान दिया। सिखों के नौवें गुरु, श्री गुरु तेग बहादुर जी ने धार्मिक स्वतंत्रता और मानवता की रक्षा के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज और उनके परिवार ने धर्म तथा सिद्धांतों की रक्षा के लिए असाधारण त्याग किया। यही कारण है कि इतिहास में उनका नाम आज भी श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता है। तौर-तरीकों में आज कितनाजमीन-आसमान का अंतर है। वहीं आज कुछ लोग जनता की भावनाओं को अपने राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति का माध्यम बनाते दिखाई देते हैं।राजेश सिंह पठानिया ने नूरपुर में सिविल अस्पताल और मातृ-शिशु अस्पताल को लेकर 6 दिनों तक चले घटनाक्रम पर सवाल उठाते हुए कहा कि आंदोलन के दौरान महिलाओं और युवाओं सहित कई लोग इससे जुड़े रहे। मातृ-शिशु अस्पताल शुरू करने के साथ-साथ रोगी कल्याण समिति का सदस्य बनाए जाने की मांग भी उठाई गई। आंदोलन के दौरान मांगें पूरी न होने पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल जारी रखने और जान देने से भी पीछे न हटने जैसी बातें कही गईं।उन्होंने सवाल उठाया कि जब आंदोलन के दौरान इतने बड़े दावे किए गए तो 6 वे दिन बाद आखिर ऐसा क्या हुआ कि भूख हड़ताल समाप्त कर दी गई? उनके अनुसार, आंदोलनकारियों ने एसडीएम की ओर से जारी पत्र के बाद अपना अनशन समाप्त किया। अब यह स्पष्ट होना चाहिए कि क्या उस पत्र से मातृ-शिशु अस्पताल को शुरू करने का रास्ता साफ हो गया है और क्या रोगी कल्याण समिति में सदस्यता की मांग पूरी हो गई है, या फिर आंदोलन का समापन केवल आश्वासन के आधार पर किया गया?राजेश सिंह पठानिया ने कहा कि स्थानीय शासन और प्रशासन ने पूरे घटनाक्रम के दौरान धैर्य बनाए रखा, लेकिन जनता के मन में उठ रहे सवालों का जवाब देना भी जरूरी है। यदि किसी आंदोलन के माध्यम से जनता को बड़ी उम्मीदें दिखाई जाती हैं, तो आंदोलन का परिणाम भी स्पष्ट और ठोस होना चाहिए।उन्होंने कहा कि अस्पताल जैसी बुनियादी स्वास्थ्य सुविधा को लेकर आवाज उठाना सराहनीय है, लेकिन जनता के हितों से जुड़े मुद्दों पर आंदोलन करने वालों को अपने दावों और वादों के प्रति जवाबदेह भी होना चाहिए। जनता को यह जानने का अधिकार है कि आंदोलन से क्या हासिल हुआ और जिन मांगों को लेकर संघर्ष शुरू किया गया था, वे कितनी पूरी हुई हैं।राजेश सिंह पठानिया ने कहा कि राजनीति में असली पहचान बड़े-बड़े भाष णों और नारों से नहीं, बल्कि जनता के हित में किए गए कामों और वादों को पूरा करने से बनती है। नूरपुर की जनता पूरे घटनाक्रम को देख रही है। 6 दिनों के आंदोलन, उसमें किए गए दावों और उसके समापन की परिस्थितियों का आकलन जनता स्वयं करेगी। आखिरकार इस आंदोलन के पीछे किस सियासी दल का आशीर्वाद था जो पर्दे के भीतर रहकर गाइड कर रहा थाl आखिरकार लोकतंत्र में जनता ही सबसे बड़ी ताकत है और समय आने पर वही अपना फैसला सुनाती है।

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