अधूरी गारंटियों के बीच नए जिलों की कवायद पर सवाल, पहले वादों का हिसाब दे सरकार : प्रो. अनुपमा सिंह
अधूरी गारंटियों के बीच नए जिलों की कवायद पर सवाल, पहले वादों का हिसाब दे सरकार : प्रो. अनुपमा सिंह
नए जिलों के गठन से पहले वित्तीय स्थिति, संभावित खर्च और जनता को मिलने वाले लाभ का ब्योरा सार्वजनिक करने की मांग
मंडी : अजय सूर्या /
हिमाचल प्रदेश में जिलों, उपमंडलों, तहसीलों और विकास खंडों के पुनर्गठन के लिए आयोग गठित किए जाने के बाद नई प्रशासनिक इकाइयों के गठन को लेकर बहस तेज हो गई है। इस बीच प्रो. अनुपमा सिंह ने सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाते हुए कहा कि नई घोषणाओं से पहले चुनावी गारंटियों की स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए। उन्होंने सरकार से जनता के समक्ष अपने वादों की पूर्ति का हिसाब रखने की मांग की।
प्रो. अनुपमा सिंह ने कहा कि लोकतंत्र में सरकार की जवाबदेही केवल नई योजनाओं और घोषणाओं तक सीमित नहीं होती, बल्कि जनता से किए गए वादों को समयबद्ध तरीके से पूरा करना भी उसकी जिम्मेदारी है। ऐसे में यह स्पष्ट होना चाहिए कि जब चुनावी गारंटियों को लेकर सवाल उठ रहे हैं, तो नए जिलों के गठन को प्राथमिकता देने के पीछे सरकार की क्या योजना है।
उन्होंने कहा कि नए जिले बनाना अपने आप में गलत नहीं है। दूरदराज के क्षेत्रों में प्रशासनिक सुविधाएं पहुंचाना और सरकारी सेवाओं तक लोगों की पहुंच आसान बनाना जरूरी है। हालांकि, किसी भी प्रशासनिक पुनर्गठन से पहले उसके संभावित लाभ, वित्तीय लागत और संसाधनों की उपलब्धता का आकलन किया जाना चाहिए।
प्रो. सिंह ने कहा कि नए जिलों के गठन के लिए कार्यालयों, भवनों, कर्मचारियों और अन्य आधारभूत सुविधाओं पर अतिरिक्त खर्च करना होगा। इसलिए सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि इस प्रक्रिया के लिए धन कहां से आएगा और इससे आम जनता को क्या ठोस लाभ मिलेगा।
उन्होंने सवाल उठाया कि क्या नई प्रशासनिक इकाइयों की चर्चा से जनता के आर्थिक और विकास संबंधी मुद्दों से ध्यान हटने की आशंका नहीं है? उन्होंने कहा कि सरकार को इस संबंध में तथ्यों और पारदर्शिता के साथ स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं से जुड़े मुद्दों पर भी समयबद्ध कार्ययोजना सामने आनी चाहिए।
चुनावी गारंटियों पर श्वेतपत्र जारी करने की मांग
प्रो. अनुपमा सिंह ने सरकार से चुनावी गारंटियों की वर्तमान स्थिति पर श्वेतपत्र अथवा विस्तृत सार्वजनिक रिपोर्ट जारी करने, नए जिलों के संभावित खर्च और वित्तीय संसाधनों का विवरण सार्वजनिक करने तथा आयोग की कार्यवाही में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की मांग की। उन्होंने प्रशासनिक पुनर्गठन को लेकर जनप्रतिनिधियों और स्थानीय नागरिकों से विचार-विमर्श करने पर भी जोर दिया।
उन्होंने कहा कि हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य में प्रशासनिक इकाइयों का पुनर्गठन भौगोलिक परिस्थितियों, जनसंख्या और स्थानीय जरूरतों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए, ताकि इसका लाभ वास्तव में आम लोगों तक पहुंचे।
प्रो. सिंह ने कहा कि सरकार का मूल्यांकन घोषणाओं की संख्या से नहीं, बल्कि धरातल पर दिखाई देने वाले परिणामों से होना चाहिए। उन्होंने कहा कि नई प्रशासनिक इकाइयों पर विचार करने के साथ-साथ सरकार को अपनी मौजूदा प्रतिबद्धताओं और विकास कार्यों की प्रगति का भी स्पष्ट हिसाब जनता के सामने रखना चाहिए।

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