सतगुरु की दया को संजोना ही साधक का परम कर्तव्य : स्वामी विकासानंद

 सतगुरु की दया को संजोना ही साधक का परम कर्तव्य : स्वामी विकासानंद


 नूरपुर : विनय महाजन /

दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के तत्वावधान में नूरपुर स्थित आश्रम में साप्ताहिक आध्यात्मिक सत्संग सभा का भव्य आयोजन किया गया। यह आयोजन दिव्य गुरु  आशुतोष महाराज  की दिव्य प्रेरणा से संपन्न हुआ, जिसमें स्वामी विकासानंद जी ने 'सतगुरु की दया को कैसे संजोएं' विषय पर गहन एवं प्रेरणादायक सत्संग किया।सभा का शुभारंभ गुरु वंदना एवं मधुर भजनों के साथ हुआ, जिनकी स्वर-लहरियों ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया। इसके उपरांत स्वामी विकासानंद जी ने अपनी ओजस्वी वाणी में सतगुरु की कृपा की महिमा का वर्णन करते हुए श्रद्धालुओं को बताया कि "सतगुरु की दया वह दिव्य संजीवनी है, जो मृतप्राय आत्मा में भी आध्यात्मिक जीवन का संचार कर देती है।"उन्होंने कहा कि मानव जीवन की वास्तविक सार्थकता तब है जब वह किसी सच्चे सतगुरु की शरण में जाकर ब्रह्मज्ञान प्राप्त करता है। किंतु ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति मात्र से ही साधना पूर्ण नहीं हो जाती। जिस प्रकार कोई अमूल्य रत्न प्राप्त होने पर उसे सुरक्षित रखने की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार सतगुरु की दया, जिसके रूप में हमें आत्मज्ञान प्राप्त होता है, उसे संजोकर रखना भी अत्यंत आवश्यक है।स्वामी जी ने आगे बताया कि सतगुरु की कृपा को बनाए रखने के लिए साधक को अपने जीवन में कुछ विशेष अनुशासनों का पालन करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि नियमित ध्यान-साधना सतगुरु की कृपा को अनुभव करने का सर्वोत्तम माध्यम है। जब साधक प्रतिदिन ब्रह्मज्ञान के आधार पर ध्यान करता है, तब उसका सतगुरु से जुड़ाव और अधिक सुदृढ़ होता है।

उन्होंने सेवा और समर्पण के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सेवा भाव ही गुरु-दया को स्थिर बनाए रखने की कुंजी है। सेवा से अहंकार का क्षय होता है और आत्मा निर्मल बनती है। इसलिए प्रत्येक साधक को तन, मन और धन से गुरु कार्य में योगदान देना चाहिए।सत्संग की महत्ता बताते हुए स्वामी जी ने कहा कि सत्संग वह अमृत है, जो साधक की अंतरात्मा को बार-बार जागृत करता है। सत्संग से प्रेरणा, ऊर्जा एवं आध्यात्मिक मार्ग पर दृढ़ता प्राप्त होती है।सभा में उपस्थित साधकों को संबोधित करते हुए स्वामी जी ने अनेक प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत किए, जिनमें साधकों ने सतगुरु की कृपा को सही ढंग से संजोकर अपने जीवन को सफल बनाया। उन्होंने कहा कि सतगुरु की दया कोई साधारण उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह आत्मा के अनेक जन्मों के संचित पुण्यों का परिणाम है। अतः इस कृपा को खोना नहीं, बल्कि दृढ़ता से थामे रखना ही साधक की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।कार्यक्रम के अंत में सभी भक्तों ने विश्व शांति एवं समस्त मानवता के कल्याण की मंगल कामना हेतु सामूहिक ध्यान साधना की। इस अवसर पर महात्मा रमन ने गुरु भक्ति से ओत-प्रोत सुमधुर भजनों का गुणगान किया, जिससे उपस्थित श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे।

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