हिम रंग षष्ठी’ के द्वितीय दिवस पर ‘बाबूजी’ का मार्मिक मंचन

 हिम रंग षष्ठी’ के द्वितीय दिवस पर ‘बाबूजी’ का मार्मिक मंचन

पुलिस अधीक्षक मदन लाल कौशल रहे मुख्यतिथि।


कुल्लू में चल रहे तीन दिवसीय राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल के ‘हिम रंग षष्ठी’ ग्रीष्मकालीन नाट्योत्सव के द्वितीय दिवस पर आज अटल सदन स्थित अंतरंग सभागार में लेखक मिथिलेश्वर की कहानी के नाट्य रूपांतरण ‘बाबूजी’ का मंचन किया गया। इस नाटक का नाट्य रूपांतरण विभांशु वैभव ने किया है तथा इसका निर्देशन रंगमंडल प्रमुख  राजेश सिंह ने किया है।

इस नाटक को लोकप्रिय नौटंकी शैली में प्रस्तुत किया गया, जिसमें प्रत्यक्ष संगीत प्रस्तुति के साथ अत्यंत रोचक और प्रभावपूर्ण ढंग से कथानक को दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत किया गया।


कार्यक्रम में पुलिस अधीक्षक मदन लाल कौशल मुख्यातिथि के रूप में उपस्थित रहे।

नाटक की शुरुआत एक अत्यंत भावुक दृश्य से होती है, जहाँ परिवार और गाँव के लोग ‘बाबूजी’ के निधन पर शोक व्यक्त कर रहे हैं। इस दौरान उनके व्यक्तित्व और जीवन-शैली को लेकर अनेक प्रश्न और चर्चाएँ सामने आती हैं।

बाबूजी, जिनका युवा अवस्था का नाम लल्लन सिंह था और जिनकी भूमिका स्वयं राजेश सिंह ने निभाई है, अपनी विचित्र आदतों के लिए नहीं, बल्कि नाटक, नृत्य और संगीत के प्रति अपने अटूट प्रेम और समर्पण के लिए याद किए जाते हैं।

फ्लैशबैक के माध्यम से दर्शक लल्लन सिंह के युवाकाल में पहुँचते हैं, जब वे सामाजिक मान्यताओं को चुनौती देने वाले एक विद्रोही स्वभाव के युवक थे। अपने ही समाज में बदनाम मानी जाने वाली एक युवती से विवाह करने का उनका निर्णय उनके स्वतंत्र व्यक्तित्व और अपने मन की बात पर अडिग रहने के स्वभाव को दर्शाता है। लल्लन का मानना था कि समाज के निर्णय उनके जीवन को नियंत्रित नहीं कर सकते। वे ऐसे व्यक्ति थे जो बिना किसी सामाजिक भय या दबाव के अपनी शर्तों पर जीवन जीना चाहते थे।

हालाँकि विवाह के बाद उनका वैवाहिक जीवन सहज नहीं रहता। प्रारम्भ में उनका साथ देने वाली पत्नी धीरे-धीरे उनके असामान्य जीवन और कला के प्रति समर्पण से असंतुष्ट होने लगती है। उसे लगता है कि लल्लन की कला ने उन्हें समाज से दूर कर दिया है। दोनों के बीच तनाव तब और बढ़ जाता है जब लल्लन अपने एक साथी कलाकार के साथ मिलकर एक ‘नाटक कम्पनी’ स्थापित करने का निर्णय लेते हैं।

जब नाटक कम्पनी की स्थापना की तैयारियाँ चल रही होती हैं और एक युवती को कलाकार एवं नर्तकी के रूप में शामिल किया जाता है, तब लल्लन की पत्नी इसका विरोध करती है। वह आरोप लगाती है कि कला के प्रति उनका जुनून उसके जीवन और स्वतंत्रता को सीमित कर रहा है तथा वह अब इस जीवन को स्वीकार नहीं कर सकती।

इसके बावजूद लल्लन अपनी कला को जीवन का अभिन्न हिस्सा मानते हैं। जब उनकी पत्नी इसे स्वीकार नहीं कर पाती, तो दोनों अलग हो जाते हैं। पत्नी अपने तीन बच्चों के साथ उन्हें छोड़ देती है, लेकिन लल्लन अपनी नाटक कम्पनी और कला के प्रति समर्पित बने रहते हैं।

समय बीतता है और लल्लन की नाटक कम्पनी अत्यंत लोकप्रिय हो जाती है। नगर के प्रतिष्ठित और सम्पन्न लोग उनके कार्यक्रमों का आयोजन कराने लगते हैं और उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल जाती है। ऐसे ही एक सम्पन्न व्यक्ति उनकी बेटी का ससुर होता है।

एक दिन जमींदार अपने पुत्र के विवाह समारोह में प्रस्तुति देने के लिए लल्लन को आमंत्रित करता है। लल्लन को यह ज्ञात नहीं होता कि जिसकी शादी में वे प्रस्तुति देने जा रहे हैं, वह उनकी अपनी बेटी है। गाँव भर में इस बात को लेकर व्यंग्य और चर्चाएँ होती हैं कि एक पिता अपनी ही बेटी के विवाह में कलाकार के रूप में प्रस्तुति देने जा रहा है और उसे इसका पता तक नहीं है।

दुर्भाग्यवश, विवाह समारोह के दौरान जमींदार द्वारा नाटक कम्पनी की एक महिला कलाकार के साथ दुर्व्यवहार करने का प्रयास किया जाता है। इसका विरोध करने पर हिंसक संघर्ष होता है, जिसमें लल्लन गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं। इसके बाद वे बिस्तर पर पड़ जाते हैं और न तो अपनी नाटक कम्पनी चला पाते हैं और न ही स्वयं का जीवन संभाल पाते हैं।

इस कठिन समय में लगभग सभी लोग उनका साथ छोड़ देते हैं। केवल सरस्वती, वही कलाकार जिसकी रक्षा उन्होंने जमींदार से की थी, उनके साथ बनी रहती है।

अपने अंतिम दिनों में बिस्तर पर पड़े, शराब के सहारे जीवन बिताते हुए बाबूजी अपने जीवन के संघर्षों और अन्यायों पर विचार करते हैं। वे प्रश्न करते हैं कि कला और जुनून को समर्पित जीवन का अंत इतनी दयनीय स्थिति में क्यों होना चाहिए, जबकि समाज में उनसे कहीं अधिक अपराध करने वाले लोग सम्मान और सुख के साथ जीवन जीते हैं।

अंततः बाबूजी अपनी छोटी-सी खाट पर अंतिम साँस लेते हैं। उनका छोटा बेटा, जो उनके कला-प्रेम को वास्तव में समझता था, गर्व के साथ अपने पिता की कहानी सुनाता है।

लल्लन सिंह उर्फ बाबूजी केवल एक व्यक्ति नहीं थे, बल्कि उन असंख्य कलाकारों का प्रतिनिधित्व करते थे जिन्हें अपने सपनों और कला के प्रति समर्पण के कारण समाज और परिवार की उपेक्षा, तिरस्कार और अस्वीकृति का सामना करना पड़ा। उन्हें अपमानित किया गया, नाम रखे गए, घर से निकाला गया, लेकिन उन्होंने अपनी कला और अपने जुनून का साथ नहीं छोड़ा। यही बाबूजी की सबसे बड़ी पहचान और विरासत है।

नाटक के अन्य प्रमुख कलाकारों में शिव प्रसाद, पूनम दहिया, शिल्पा भारती, अनंत शर्मा, सत्येन्द्र सत्येन्द्र मलिक, अंकुर सिंह, प्रतीक वडेरा, आलोक कुमार, तबिश खान, मुजीबुर रहमान तथा अप्सरा खान आदि शामिल हैं।

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