वेनेजुएला भूकंप और मानव सीमाएं – क्या हम आपदाओं के लिए तैयार हैं? 

 वेनेजुएला भूकंप और मानव सीमाएं – क्या हम आपदाओं के लिए तैयार हैं?  

                                                                                                                                                                                                              भूकंप पृथ्वी की सतह पर अचानक आने वाला कंपन है, जो पृथ्वी के भीतर ऊर्जा के अचानक मुक्त होने के कारण उत्पन्न होता है। भूकंप पृथ्वी की सतह के नीचे गहराई में स्थित विवर्तनिक प्लेटों  की गतिविधियों के कारण आते हैं। इन प्लेटों के बीच बनने वाला दबाव, तनाव और ऊर्जा का संचय अत्यंत जटिल और अनिश्चित प्रक्रिया है। भूकंप एक ऐसी आपदा है जो बिना किसी स्पष्ट चेतावनी के आती है और अपने पीछे विनाश का लंबा निशान छोड़ जाती है। इसके कारण इमारतें धराशायी हो सकती हैं, सड़कें टूट सकती हैं, बिजली और संचार व्यवस्था ठप पड़ सकती है और जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। वर्तमान में विज्ञान भूकंप का सटीक पूर्वानुमान लगाने में सक्षम नहीं है, क्योंकि पृथ्वी के भीतर होने वाली प्रक्रियाओं को पूरी तरह मापना और समझना अभी भी एक बड़ी वैज्ञानिक चुनौती है। दक्षिण अमेरिका के देश वेनेजुएला में आए दो शक्तिशाली भूकंपों ने एक बार फिर पूरी दुनिया को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि प्रकृति के सामने मनुष्य की वैज्ञानिक उपलब्धियां अभी भी सीमित हैं। आधुनिक विज्ञान ने अंतरिक्ष की गहराइयों तक पहुंच बना ली है, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का विकास कर लिया है, मौसम का पूर्वानुमान लगाने में उल्लेखनीय सफलता हासिल कर ली है, लेकिन भूकंप जैसी विनाशकारी प्राकृतिक आपदा के सटीक पूर्वानुमान में अब भी सफलता नहीं मिल सकी है। यही कारण है कि जब भी किसी क्षेत्र में  शक्तिशाली भूकंप आता है, तो हजारों लोगों की जान खतरे में पड़ जाती है और करोड़ों रुपये की संपत्ति कुछ ही क्षणों में नष्ट हो जाती है। वेनेजुएला में आए इन भूकंपों ने न केवल स्थानीय लोगों में भय का माहौल पैदा किया, बल्कि विश्व समुदाय को भी चेतावनी दी है कि प्राकृतिक आपदाओं के प्रति हमारी तैयारियां अभी पर्याप्त नहीं हैं। भूकंप ऐसी आपदा है जो बिना किसी स्पष्ट चेतावनी के आती है और अपने पीछे विनाश का लंबा निशान छोड़ जाती है। कई बार इमारतें धराशायी हो जाती हैं, सड़कें टूट जाती हैं, बिजली और संचार व्यवस्था ठप पड़ जाती है तथा सामान्य जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर वैज्ञानिक आज तक भूकंप का सटीक पूर्वानुमान लगाने में सफल क्यों नहीं हो पाए हैं? जब मौसम वैज्ञानिक कई दिन पहले यह बता सकते हैं कि कब बारिश होगी, कब तूफान आएगा या कब तापमान बढ़ेगा, तो भूकंप के मामले में ऐसी सटीकता क्यों संभव नहीं हो पाई है? इसका उत्तर पृथ्वी की जटिल संरचना में छिपा हुआ है। मौसम संबंधी घटनाएं वायुमंडल में घटित होती हैं, जहां उपग्रहों, रडारों और अन्य उपकरणों की सहायता से निरंतर निगरानी की जा सकती है। इसके विपरीत भूकंप पृथ्वी की सतह के नीचे गहराई में स्थित विवर्तनिक प्लेटों की गतिविधियों के कारण उत्पन्न होते हैं। इन प्लेटों के बीच बनने वाले दबाव, तनाव और ऊर्जा संचय की प्रक्रिया अत्यंत जटिल और अनिश्चित होती है। वैज्ञानिक यह तो समझ चुके हैं कि भूकंप किन कारणों से आते हैं और किन क्षेत्रों में उनका जोखिम अधिक है, लेकिन वे यह नहीं बता सकते कि किसी विशेष स्थान पर, किसी विशेष दिन और किसी विशेष समय पर भूकंप कब आएगा। पृथ्वी के भीतर होने वाली प्रक्रियाओं को पूरी तरह मापना और समझना आज भी विज्ञान के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। यही वजह है कि दुनियाभर के वैज्ञानिक संस्थान वर्षों से इस दिशा में शोध कर रहे हैं, लेकिन अभी तक ऐसी कोई तकनीक विकसित नहीं हो सकी है जो मौसम पूर्वानुमान की तरह भूकंप की सटीक भविष्यवाणी कर सके। यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि यदि वैज्ञानिक भूकंप का विश्वसनीय पूर्वानुमान लगाने में सफल हो जाएं, तो लाखों लोगों की जान बचाई जा सकती है। केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों और वन्य जीवों को भी सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सकता है। अस्पतालों, स्कूलों, उद्योगों और सार्वजनिक परिवहन प्रणालियों को समय रहते बंद या सुरक्षित किया जा सकता है। आपदा प्रबंधन एजेंसियां राहत और बचाव दलों को पहले से तैयार रख सकती हैं। इससे जनहानि और आर्थिक नुकसान दोनों में भारी कमी लाई जा सकती है। हालांकि कुछ देशों ने प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियां विकसित की हैं जो भूकंप शुरू होने के कुछ सेकंड या कुछ दर्जन सेकंड बाद चेतावनी दे सकती हैं। यह तकनीक भूकंप का पूर्वानुमान नहीं लगाती, बल्कि भूकंपीय तरंगों का पता लगाकर प्रभावित क्षेत्रों को तत्काल अलर्ट भेजती है। कुछ सेकंड का यह समय भी ट्रेनों को रोकने, गैस आपूर्ति बंद करने और लोगों को सुरक्षित स्थिति में आने का अवसर दे सकता है। फिर भी यह पूर्ण समाधान नहीं है। वास्तविक आवश्यकता ऐसी तकनीक की है जो भूकंप आने से घंटों, दिनों या सप्ताहों पहले विश्वसनीय चेतावनी दे सके। जब तक ऐसी तकनीक विकसित नहीं होती, तब तक हमें आपदा प्रबंधन और जन-जागरूकता पर अधिक ध्यान देना होगा। भूकंप प्रभावित क्षेत्रों में निर्माण कार्य के लिए अत्यधिक सख्त और भूकंप-रोधी मानकों को अनिवार्य बनाना चाहिए ताकि भवनों के गिरने का खतरा कम हो सके।वर्तमान में मौजूद चेतावनी प्रणालियां, जो कुछ सेकंड पहले अलर्ट देती हैं, उन्हें अधिक उन्नत बनाकर देशभर में लागू करना चाहिए। यह अल्प समय भी ट्रेनों को रोकने और गैस आपूर्ति बंद करने जैसे बड़े नुकसान को टालने में सहायक है। आपदा प्रबंधन एजेंसियां' और 'जन-जागरूकता' पर विशेष ध्यान देना होगा। स्थानीय स्तर पर स्वयंसेवकों को तैयार करना और स्कूल-कॉलेजों में नियमित मॉक ड्रिल करना अनिवार्य होना चाहिए। वैज्ञानिक संस्थानों को केवल पूर्वानुमान तक सीमित न रहकर पृथ्वी के भीतर होने वाली हलचलों को बेहतर ढंग से समझने के लिए अधिक उन्नत डेटा-आधारित शोध में निवेश करना होगा। वेनेजुएला की त्रासदी हमें सचेत करती है कि प्राकृतिक आपदाएं बिना किसी चेतावनी के आती हैं और भारी विनाश छोड़ जाती हैं। हालांकि हम भूकंप को रोक नहीं सकते, लेकिन अपनी सतर्कता, बेहतर बुनियादी ढांचे और जन-जागरूकता के माध्यम से हम जनहानि और आर्थिक क्षति को न्यूनतम अवश्य कर सकते हैं। समय की मांग है कि हम 'प्रतिक्रिया' से आगे बढ़कर 'तैयारी' पर ध्यान केंद्रित करें।                                                            लेखक: राजन कुमार शर्मा

गांव डुगली, उप तहसील लंबलू, 
जिला हमीरपुर, 
हिमाचल प्रदेश 


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