अवतार का अर्थ है परम तत्व का जनकल्याण के लिए धरा पर अवतरण -साध्वी भाग्य भारती
अवतार का अर्थ है परम तत्व का जनकल्याण के लिए धरा पर अवतरण -साध्वी भाग्य भारती
नूरपुर : विनय महाजन /
दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के द्वारा श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस में कथा व्यास साध्वी भाग्य भारती ने गजेन्द्र प्रसंग सुनाते हुए बताया कि गजेन्द्र की कहानी प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का प्रतीक है।
आज का इंसान भी तो इस संसार में आकर संसार के भोग-विलासो में, रिश्तों-नातों में ही मस्त रहता है। किन्तु जब काल आक्रमण करता है तो कोई भी साथ नहीं देता। क्योंकि संसार के जो रिश्ते हैं, वह स्वार्थ की नींव पर टिके होते हैं। जो सम्बन्ध स्वार्थ की नींव पर टिके होते हैं वह सदा साथ नहीं निभाते। इसलिए क्यों न एक ऐसे शाश्वत रिश्ते की तलाश की जाए, जो ज़िन्दगी को एक मजबूत आधार दे और सुरक्षा देऔर निर्भय होl इस संसार में यदि कोई पूर्ण रूपेण निर्भय है तो वह केवल ईश्वर है। इसलिए आवश्यकता है उस ईश्वर को जानने की। साध्वी ने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण निराकार ब्रह्म है, जो अधर्म ,पाप , अत्याचार के बोझ तले दबी वसुंधरा पर त्रस्त जनमानस की करुण पुकार सुनकर धर्मस्थापना हेतु धरा पर अवतरित होते है। साध्वी जी बताया जिस प्रकार प्रकाश से दूर रहना ही अंधकार है उसी प्रकार प्रभु से दूर रहना ही दुख, संताप व् क्षोभ का कारण है। अवतार शब्द का अर्थ बताते हुए उन्होंने बताया कि अवतार का अर्थ है नीचे उतरना। अपनी परम अवस्था से जन कल्याण के लिए धरा पर उतरा परम तत्व ही ईश्वर अर्थात् अवतार कहलाता है। जहां एक मानव अपने कर्म बंधनों में जकड़ा हुआ, अपने कर्मों के फल को भोगने के भोगने के लिए इस धरती पर आता है, वहीं पर वह ईश्वर अपनी योग माया के द्वारा प्रकृति को अधीन कर, मानव को सही राह दिखाने के लिए इस धरती पर आते हैंl तत्त्व भाव दिव्य दृष्टि के माध्यम से अपने अन्त: करन में परमात्मा का दर्शन करना।और कथा के दौरान यजमान पुजन भी किया जाता है।
और ज्योति जलाने की रस्म भी निभाई जाती है।


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