भर्ती एवं सेवा शर्तें कानून पर हाईकोर्ट का फैसला सुक्खू सरकार की कर्मचारी विरोधी सोच पर करारा तमाचा : बिक्रम ठाकुर
भर्ती एवं सेवा शर्तें कानून पर हाईकोर्ट का फैसला सुक्खू सरकार की कर्मचारी विरोधी सोच पर करारा तमाचा : बिक्रम ठाकुर
कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों को अधिकारों से वंचित करने की साजिश बेनकाब, दो साल से हक दबाकर बैठी है सरकार
धर्मशाला भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व उद्योग मंत्री बिक्रम ठाकुर ने हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा भर्ती एवं सेवा शर्तें कानून को निरस्त किए जाने के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि यह निर्णय सुक्खू सरकार की असंवैधानिक, तुगलकी और कर्मचारी विरोधी नीतियों की सच्चाई को उजागर करता है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सरकार ने शुरुआत से ही इस कानून के माध्यम से कर्मचारियों के अधिकारों के साथ खिलवाड़ करने की कोशिश की, लेकिन न्यायालय ने समय रहते इस अन्याय पर रोक लगा दी।
बिक्रम ठाकुर ने कहा कि सरकार ने यह कानून केवल इसलिए लाया था ताकि कर्मचारियों की सेवा शर्तों में मनमाना बदलाव कर उनकी वरिष्ठता, वेतनवृद्धि और अन्य लाभों को सीमित किया जा सके। विशेष रूप से सेवा लाभों के विस्तार (पैरा-6) में यह स्पष्ट किया गया था कि केवल नियमित कर्मचारियों को ही सभी लाभ मिलेंगे, जबकि कॉन्ट्रैक्ट पर कार्यरत कर्मचारियों को इन अधिकारों से पूरी तरह वंचित रखा जाएगा। इतना ही नहीं, यदि किसी कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी को पूर्व में कोई लाभ दिया गया हो, तो उसे भी वापस लेने का प्रावधान किया गया था, जो पूरी तरह अन्यायपूर्ण और अमानवीय था।
उन्होंने कहा कि इसी भेदभावपूर्ण प्रावधान के खिलाफ प्रदेश के हजारों कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी न्यायालय की शरण में गए। उच्च न्यायालय ने इस कानून को निरस्त कर यह स्पष्ट कर दिया कि सरकार का उद्देश्य कर्मचारियों को न्याय देना नहीं, बल्कि उनके अधिकार छीनना था। यह फैसला कर्मचारियों के संघर्ष की जीत है और सरकार की नीतियों की हार है।
पूर्व मंत्री ने आरोप लगाया कि सुक्खू सरकार पिछले दो वर्षों से कर्मचारियों के अधिकारों को दबाकर बैठी है और उन्हें उनका वैधानिक हक देने से बच रही है। सरकार कर्मचारी हितैषी होने का दिखावा करती है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि हर अवसर पर कर्मचारियों के साथ अन्याय किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सरकार अपनी वित्तीय जिम्मेदारियों से बचने और देनदारियों को भविष्य पर टालने के लिए इस प्रकार के असंवैधानिक कानून बना रही थी।
बिक्रम ठाकुर ने कहा कि यह पहला मौका नहीं है जब सुक्खू सरकार को न्यायालय में झटका लगा हो। इससे पहले भी सरकार के कई फैसले न्यायालय द्वारा खारिज किए जा चुके हैं, जिससे यह साफ हो गया है कि सरकार बिना कानूनी आधार के निर्णय ले रही है। मुख्यमंत्री और उनकी टीम केवल राजनीतिक फायदे के लिए फैसले ले रही है, जिनका कानून और संविधान से कोई लेना-देना नहीं है।
उन्होंने कहा कि प्रदेश की जनता के टैक्स का पैसा करोड़ों रुपये वकीलों और कानूनी लड़ाइयों पर खर्च किया जा रहा है, लेकिन सरकार को हर बार हार का सामना करना पड़ रहा है। यह न केवल वित्तीय कुप्रबंधन का उदाहरण है, बल्कि जनता के साथ भी अन्याय है।
बिक्रम ठाकुर ने कहा कि यदि सरकार में जरा भी नैतिकता बची है तो उसे तुरंत कर्मचारियों के सभी लंबित अधिकार और लाभ जारी करने चाहिए। कर्मचारियों को उनके हक के लिए अदालतों के चक्कर लगाने पर मजबूर करना सरकार की विफलता को दर्शाता है।
उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी ने सदन के भीतर और बाहर इस कानून का लगातार विरोध किया था और सरकार को चेताया था कि यह कानून न्यायालय में टिक नहीं पाएगा। आज उच्च न्यायालय के फैसले ने भाजपा की बात को सही साबित कर दिया है।
अंत में बिक्रम ठाकुर ने सरकार को आगाह करते हुए कहा कि वह भविष्य में इस प्रकार के तुगलकी और असंवैधानिक फैसले लेने से बाज आए और कर्मचारियों के हितों की रक्षा सुनिश्चित करे। उन्होंने स्पष्ट किया कि भाजपा कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा के लिए हर स्तर पर संघर्ष करती रहेगी और किसी भी कीमत पर कर्मचारियों के साथ अन्याय नहीं होने दिया जाएगा।

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