"उच्च शिक्षा में भारतीय ज्ञान परंपरा" पर एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन
"उच्च शिक्षा में भारतीय ज्ञान परंपरा" पर एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन
भारतीय शिक्षण मंडल, हिमाचल प्रांत एवं जी.जी.डी.एस.डी. महाविद्यालय, राजपुर के संयुक्त तत्वावधान में भारतीय शिक्षण मंडल के 57वें स्थापना दिवस के अवसर पर “उच्च शिक्षा में भारतीय ज्ञान परंपरा” विषय पर एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी का उद्देश्य विद्यार्थियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना और भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल्यों को आधुनिक शिक्षा प्रणाली में पुनर्स्थापित करना था।
कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि प्रो. अशोक कुमार सरयाल पूर्व कुलपति, चौधरी सरवन कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर एवं प्रांत संयोजक, ग्राम विकास गतिविधि, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भाग लिया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि भारत को विश्वगुरु बनने के लिए अपनी शिक्षा परंपराओं का संरक्षण अनिवार्य है। उन्होंने ज्ञान के चार प्रमुख स्तंभ—ज्ञानार्जन, संरक्षण, संवर्धन तथा अनुकूलन—पर विशेष बल दिया।
उन्होंने हिमाचल प्रदेश में बढ़ती बेरोजगारी पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि शिक्षा प्रणाली को रोजगारपरक, नैतिक और व्यावहार आधारित होना चाहिए। साथ ही उन्होंने शिक्षकों के आचरण पर विशेष जोर देते हुए कहा कि शिक्षक का चरित्र ही विद्यार्थियों के निर्माण का आधार होता है।
कार्यक्रम का शुभारंभ महाविद्यालय के निदेशक एवं प्राचार्य डॉ. विवेक शर्मा द्वारा सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए किया गया। उन्होंने अपने संबोधन में भारतीय ज्ञान परंपरा को केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए मार्गदर्शक बताया।
विशिष्ट अतिथि निदेशक, एमएमटीटीसी, केंद्रीय विश्वविद्यालय हिमाचल प्रदेश और अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख, भारतीय शिक्षण मंडल प्रो.. संदीप कुलश्रेष्ठ, ने अपने संबोधन में अध्ययन विधि पर विशेष बल देते हुए कहा कि प्रभावी अध्ययन पद्धति ही ज्ञान को स्थायी और सार्थक बनाती है। उन्होंने कहा कि मानव जन्म अत्यंत दुर्लभ है और इसे सार्थक दिशा में उपयोग करना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है।
डॉ. ओम प्रकाश प्रजापति, प्रांत सह मंत्री, भारतीय शिक्षण मंडल, हिमाचल प्रांत ने शिक्षा में परिवर्तन की आवश्यकता पर बल देते हुए मातृभाषा में शिक्षा के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि अन्य देशों में अपनी भाषा को प्राथमिकता दी जाती है, जबकि हमारे देश में इसकी उपेक्षा देखने को मिलती है। उन्होंने मातृ भाषा को शिक्षा की गुणवत्ता का आधार बताया।
विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. संगीता सिंह, प्राचार्या, राजकीय महाविद्यालय शिवनगर ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता एवं प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा के समन्वय पर अपने विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में भारतीय ज्ञान की प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए कहा कि परंपरा और आधुनिकता के संतुलन से ही आत्मज्ञान संभव है। उन्होंने भारतीय परंपरा के उदाहरणों और आज के युग में उनके महत्व पर प्रकाश डालते हुए तालमेल से परंपरा और आधुनिकता के सामंजस्य से आत्मज्ञान को जागृत करने की बात कही और विद्यार्थियों को तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ नैतिक मूल्यों को अपनाते हुए अपने भविष्य को संवारने का संदेश दिया।8
प्रो. कुलभूषण चंदेल, अध्यक्ष, भारतीय शिक्षण मंडल, हिमाचल प्रांत ने भारतीय ज्ञान परंपरा की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्राचीन भारत में शिक्षा जीवन जीने की संपूर्ण पद्धति थी। गुरुकुल व्यवस्था के माध्यम से विद्यार्थियों का समग्र विकास किया जाता था, किंतु औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली के प्रभाव से हम अपने मूल स्वरूप से दूर हो गए। उन्होंने रामायण के उदाहरणों के माध्यम से मूल ग्रंथों से जुड़ने और मूल्यों पर आधारित जीवन अपनाने का संदेश दिया।
कार्यक्रम का मंच संचालन डॉ. नीतिका शर्मा, संयोजिका एवं सह प्रमुख, महिला गतिविधि, भारतीय शिक्षण मंडल, हिमाचल प्रांत द्वारा किया गया।
डॉ जगवीर चंदेल , उपाध्यक्ष , भारतीय शिक्षण मंडल , हिमाचल प्रांत ने कार्यक्रम के अंत में सभी अतिथियों का आभार प्रकट किया। कार्यक्रम में महाविद्यालय के प्राध्यापकगण एवं विद्यार्थियों ने भी भाग लिया।

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