कभी-कभी विरोध ही किसी नेता की सबसे बड़ी ताकत बन जाता है
कभी-कभी विरोध ही किसी नेता की सबसे बड़ी ताकत बन जाता है
नूरपुर : विनय महाजन /
नूरपुर विधानसभा क्षेत्र मे जिला परिषद राजनीति इस बार केवल चुनावी मुकाबला नहीं रह गई, बल्कि बीजेपी परिवार के दो धडो मे यह प्रतिष्ठा व अस्तित्व और अंदरूनी शक्ति प्रदर्शन की लड़ाई बनती चुकी है lसबसे दिलचस्प बात यह है कि जिस रणनीति के तहत एक खेमे को राजनीतिक रूप से घेरने और कमजोर करने का प्रयास किया गया वही रणनीति अब उसके लिए सबसे बड़ा संजीवनी मंत्र साबित होती नजर आ रही है। और कांग्रेस इस मामले में चुप रहकर दोनों धड़ो की लड़ाई का लाभ उठाने के लिए जिज्ञासु होकर चुनाव जीतने की आस लगाए हुए है नगर परिषद के चुनावों मे कांग्रेस विपक्ष की इस गुड वादी का लाभ उठाकर नगर परिषद में अपना परचम लहरा चुकी है और अब जिला परिषद और पंचायत समिति के चुनावों के परिणाम का इंतजार है l कांग्रेस का यही चुनावी नारा है चुप रहकर सियासत की राजनीति करो l पिछले कुछ समय से क्षेत्र की राजनीति में लगातार बयानबाजी, आरोप-प्रत्यारोप और राजनीतिक हमलों का दौर चलता रहा। शायद यह सोचा गया था कि लगातार दबाव बनाकर विरोधी खेमे का मनोबल तोड़ दिया जाएगा उसके कार्यकर्ताओं को निष्क्रिय कर दिया जाएगा और उसकी राजनीतिक पकड़ कमजोर पड़ जाएगी। लेकिन राजनीति केवल जोड़-तोड़ और गणित का खेल नहीं होती। राजनीति भावनाओं, सम्मान और कार्यकर्ताओं की निष्ठा पर भी चलती है। यही वह बिंदु रहा जहां पूरा समीकरण पलटता नजर आया।जिस खेमे को कमजोर समझा जा रहा था, उसके समर्थकों ने इन हमलों को सामान्य राजनीतिक आलोचना नहीं माना, बल्कि इसे अपने राजनीतिक अस्तित्व पर सीधा प्रहार समझा। परिणाम यह हुआ कि लंबे समय से बिखरा और निष्क्रिय पड़ा कार्यकर्ता वर्ग अचानक फिर से सक्रिय हो गया। गांव-गांव, पंचायत-पंचायत और बूथ स्तर तक यह संदेश फैल गया कि यदि अब भी एकजुट नहीं हुए, तो आने वाले समय में राजनीतिक जमीन खिसक सकती है। यहीं से जिला परिषद चुनाव “करो या मरो” की लड़ाई में बदलते दिखाई देने लगे। जिला परिषद के चुनाव प्रचार में ऐसा कई बार देखा गया है जहां पर कांग्रेस प्रत्याशियों की आलोचना तो नहीं लेकिन एक ही बार के अपने आमने-सामने नेताओं के खिलाफ साजिश करता रहा l चुनावी पोस्टरो में यह सब कुछ स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि भाजपा कांग्रेस के साथ नहीं अपनों के साथ ही चुनावी लड़ाई लड़ रही है l क्या इसे आने वाले विधानसभा 2027 के चुनाव का ट्रेलर समझा जाए या और कुछ l उसके समर्थित उम्मीदवार कई जगह अपेक्षित बढ़त बनाते नजर नहीं आ रहे। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि विरोधियों को कमजोर करने के प्रयास में अनजाने में उन्हें फिर से राजनीतिक केंद्र में ला खड़ा किया गया।
विचारधारा आधारित राजनीति में कार्यकर्ता हमेशा संगठन और सामूहिकता को प्राथमिकता देता है। ऐसे में खुली गुटबाजी और लगातार अंदरूनी संघर्ष आम कार्यकर्ता को असहज भी करते हैं। कार्यकर्ताओं के बीच यह सवाल भी सुनाई दे रहा है कि जब लड़ाई राजनीतिक विरोधियों से होनी चाहिए थी, तब ऊर्जा अपने ही लोगों को कमजोर करने में क्यों लगाई गई?
31 मई को परिणाम आने के बाद ही असली तस्वीर सामने आएगी। तब पता चलेगा कि जनता ने किस रणनीति को स्वीकार किया और किसे राजनीतिक भूल मानकर नकार दिया।

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