रथ-रथनी जातर: प्रशासन की अनभिज्ञता से कहीं इतिहास न बन जाए यह ऐतिहासिक परंपरा
रथ-रथनी जातर: प्रशासन की अनभिज्ञता से कहीं इतिहास न बन जाए यह ऐतिहासिक परंपरा
चंबा : जितेन्द्र खन्ना /
चंबा में मनाई जाने वाली पारंपरिक जातरों में रथ-रथनी जातर का विशेष धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व है। यह जातर प्रतिवर्ष भाद्रपद माह की पूर्णिमा को चंबा नगर में धार्मिक आस्था, श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाई जाती है। पौराणिक कथा पर आधारित इस यात्रा महोत्सव में भगवान शिव को भस्मासुर से बचाने और उसके अंत की कथा का प्रभावशाली मंचन किया जाता है। यह आयोजन पहाड़ी जनपद की विशिष्ट धार्मिक एवं लोक संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार वृक नामक असुर ने कठोर तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया और ऐसा वरदान प्राप्त किया कि वह जिसके सिर पर हाथ रखेगा, वह भस्म हो जाएगा। वरदान प्राप्त करने के बाद वह मदांध हो गया और पार्वती को पाने की इच्छा से भगवान शिव के पीछे पड़ गया। शिव वहां से निकलकर भगवान विष्णु के पास पहुंचे। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण किया और भस्मासुर को अपने साथ नृत्य करने के लिए प्रेरित किया। मोहिनी के नृत्य की नकल करते हुए भस्मासुर ने अपना हाथ अपने ही सिर पर रख दिया और वरदान के प्रभाव से स्वयं भस्म हो गया।
भस्मीदन्त दैत्य से जुड़ी है स्थानीय जनश्रुति
स्थानीय जनश्रुति के अनुसार करीब 1100 वर्ष पूर्व भस्मीदन्त नामक एक दैत्य उस स्थान पर रहता था, जहां वर्तमान में हरिराय मंदिर स्थित है। उसके आतंक से परेशान होकर लोग काशी से आए चौरासी सिद्धों के साथ पहुंचे चरपट नाथ के पास गए। चरपट नाथ ने कठोर साधना कर दैत्य को प्रकट किया। इसके बाद दैत्य ने क्षेत्र में दोबारा नहीं आने का आश्वासन दिया और योगी से प्रार्थना की कि प्रत्येक वर्ष इस स्थान पर उसका स्मरणोत्सव मनाया जाए। मान्यता है कि इसी परंपरा के चलते रथ-रथनी जातर का आयोजन शुरू हुआ।
इस तरह होती है रथ और रथनी की तैयारी
रथ-रथनी जातर से एक दिन पहले नगर के प्राचीन लक्ष्मी-नारायण मंदिर समूह में स्थित चंद्रगुप्त मंदिर के सामने त्रिपुर सुंदरी मोहिनी की प्रतिमा को सजाया और श्रृंगार किया जाता है। फल, मिठाई और सुगंधित धूप अर्पित की जाती है। नारियल को देवी के प्रतीकात्मक बलि स्वरूप फोड़ा जाता है और उसे पालकी में स्थापित किया जाता है। यही पालकी रथनी का प्रतीक मानी जाती है। प्रतिमा को रातभर मंदिर में जागरण के लिए रखा जाता है।
इसी दौरान हरिराय मंदिर में भस्मीदन्त के प्रतीक रथ को तैयार किया जाता है। लकड़ी के ढांचे को नए सफेद कपड़े से सजाया जाता है और विधि-विधान से पूजा की जाती है। रक्षा बंधन के अवसर पर बांधी गई रखड़ी को उतारकर कुछ धनराशि के साथ रथ पर रखा जाता है। रथ के साथ बिच्छू बूटी बांधी जाती है और उस पर पवित्र जल का छिड़काव किया जाता है। धूप और दीप जलाकर मंत्रोच्चार के साथ रथ को जीवदान देने की परंपरा निभाई जाती है।
परंपरा के अनुसार बकरे की बलि भी इस आयोजन का हिस्सा रही है। इसके बाद रथ को उठाते समय महिलाएं और बच्चे रथ के नीचे से पांच से सात बार गुजरते हैं। स्थानीय मान्यता है कि ऐसा करने से बुरी नजर और दुरात्माओं के प्रभाव से रक्षा होती है।
चौहाटड़े में होता है रथ-रथनी का मिलन
सूर्यास्त से पहले लक्ष्मी-नारायण मंदिर परिसर स्थित चंद्रगुप्त मंदिर से रथनी की पालकी निकाली जाती है। वहीं हरिराय मंदिर से भस्मीदन्त के प्रतीक रथ को कहार कंधों पर उठाकर लाते हैं। इसके बाद चौहाटड़े में रथ और रथनी का प्रतीकात्मक मिलन होता है।
इस दौरान रथनी पक्ष के युवा रथ को अपने कब्जे में लेने का प्रयास करते हैं, जबकि रथ के साथ चल रहे युवा उसे बचाने का प्रयास करते हैं। परंपरागत रूप से बिच्छू बूटी का इस्तेमाल किया जाता है। रथनी पक्ष के युवा पीछे से पत्थर और टोटू आदि फेंकते हुए रथ को ले जाने वालों का पीछा करते हैं। इसके बाद रथ को लेकर युवा पूरे शहर की परिक्रमा करते हैं।
रथनी को मिलन के तुरंत बाद पास स्थित चम्पावती मंदिर ले जाया जाता है। शहर की परिक्रमा के बाद रथ को चौगान में रखा जाता है, जहां एकत्रित लोग रथ पर लिपटे कपड़े को प्रसाद स्वरूप प्राप्त करते हैं। मान्यता है कि कपड़े के इन टुकड़ों को घर ले जाकर पूजा स्थल अथवा सिरहाने के नीचे रखने से दुरात्माओं से रक्षा होती है।
पिछले वर्ष आयोजन न होने से उठे सवाल
डॉ. राजेश सहगल के अनुसार पिछले वर्ष किसी कारणवश रथ-रथनी जातर का आयोजन नहीं हो सका। उनका कहना है कि ऐसी ऐतिहासिक और धार्मिक परंपरा का आयोजन न होना केवल एक मेले का छूट जाना नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण से जुड़ा विषय है।
उन्होंने कहा कि जिला मुख्यालय में प्रशासन तथा भाषा एवं संस्कृति विभाग को ऐसी ऐतिहासिक जातरों और स्थानीय परंपराओं की जानकारी एवं संरक्षण के लिए गंभीरता से प्रयास करने चाहिए। यदि जिला मुख्यालय की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक जातर ही प्रशासन की जानकारी से बाहर रहेगी तो दूरदराज क्षेत्रों की लोक परंपराओं और मेलों के संरक्षण की स्थिति पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।
स्थानीय नागरिकों की ओर से इस वर्ष रथ-रथनी जातर की परंपरा को दोबारा आयोजित करवाने के प्रयास किए जा रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि सदियों पुरानी इस सांस्कृतिक परंपरा की निरंतरता बनाए रखना आवश्यक है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी चंबा की इस विशिष्ट लोक-सांस्कृतिक विरासत से परिचित हो सकें।
— डॉ. राजेश सहगल
पुरातत्वविद एवं स्थानीय निवासी, चंबा (हिमाचल प्रदेश)

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